मक्का, गन्ना और चावल से
इथेनॉल कैसे बनता है?
1 लीटर इथेनॉल में कितना पानी लगता है? फायदे, नुकसान और नदी, भूमिगत जल, भूमि तथा खाली ज़मीन पर क्या असर पड़ता है — सब कुछ विस्तार से
1. परिचय — इथेनॉल क्या है?
इथेनॉल की परिभाषा, रासायनिक संरचना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इथेनॉल (Ethanol) एक रंगहीन, पारदर्शी तरल पदार्थ है जिसका रासायनिक सूत्र C₂H₅OH है। यह शराब (alcohol) का मुख्य घटक है और इसे एथिल अल्कोहल (Ethyl Alcohol) के नाम से भी जाना जाता है। इथेनॉल का उपयोग सदियों से मनुष्य द्वारा किया जा रहा है। प्राचीन काल में यह मुख्य रूप से पेय पदार्थ के रूप में प्रयोग होता था, लेकिन आधुनिक युग में इसका उपयोग ईंधन (fuel), औद्योगिक घोलक (solvent), दवाइयों (pharmaceuticals), और सौन्दर्य प्रसाधनों (cosmetics) में व्यापक रूप से हो रहा है। इथेनॉल का क्वथनांक 78.4°C है, घनत्व 0.789 g/mL है, और यह पानी के साथ हर अनुपात में मिश्रण बनाता है। यह विशेषता ही इसे अन्य अल्कोहल से अलग करती है और इसी कारण इसे शुद्ध करना (distillation) आसान भी और कठिन भी है। इथेनॉल की गंध हल्की मीठी होती है और यह जलने पर नीली लौह पैदा करता है।
इथेनॉल का इतिहास बहुत पुराना है। माना जाता है कि लगभग 9000 साल पहले मेसोपोटामिया और चीन में सबसे पहले किण्वन (fermentation) की प्रक्रिया खोजी गई थी। तब से इसे शराब बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। बारहवीं शताब्दी में इटली में पहली बार आसवन (distillation) तकनीक का विकास हुआ जिससे अधिक शुद्ध इथेनॉल प्राप्त होने लगा। बीसवीं शताब्दी में जब ऑटोमोबाइल आए, तब हेनरी फोर्ड ने अपनी मॉडल T कार को इथेनॉल पर चलाने की कोशिश की थी। लेकिन पेट्रोल सस्ता और आसानी से उपलब्ध होने के कारण इथेनॉल पीछे छूट गया। 1970 के तेल संकट के बाद ब्राजील ने सबसे पहले इथेनॉल को ईंधन के रूप में गंभीरता से अपनाया और आज ब्राजील दुनिया का सबसे बड़ा इथेनॉल उत्पादक और उपयोगकर्ता देश है। भारत में इथेनॉल की यात्रा 2000 के दशक में शुरू हुई जब पहली बार 5% ब्लेंडिंग का प्रयोग किया गया।
इथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से दो तरीकों से होता है। पहला तरीका जैविक विधि (Biological Method) है जिसमें कार्बोहाइड्रेटयुक्त पदार्थों जैसे मक्का, गन्ना, चावल, गेहूं, जौ आदि को यीस्ट (yeast) के साथ किण्वन कराया जाता है। यीस्ट कोशिकाएं शर्करा को इथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड में बदल देती हैं। दूसरा तरीका पेट्रोकेमिकल विधि है जिसमें एथिलीन गैस को जल युक्त फॉस्फोरिक अम्ल के संपर्क में रखकर इथेनॉल बनाया जाता है। इस ब्लॉग पोस्ट में हम केवल जैविक विधि पर ध्यान केंद्रित करेंगे क्योंकि यही विधि कृषि आधारित है और इससे जल, भूमि और पर्यावरण पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।
रासायनिक समीकरण: C₆H₁₂O₆ → 2C₂H₅OH + 2CO₂ — यानी 1 अणु ग्लूकोज से 2 अणु इथेनॉल और 2 अणु कार्बन डाइऑक्साइड बनते हैं। सैद्धांतिक रूप से 1 किलो ग्लूकोज से 0.511 ग्राम इथेनॉल बन सकता है, लेकिन व्यावहारिक उपज कम होती है क्योंकि कुछ शर्करा यीस्ट के विकास में भी खर्च होती है।
इथेनॉल के प्रमुख उपयोग
- ईंधन के रूप में: इथेनॉल को पेट्रोल में मिलाकर E5, E10, E20 और E85 ईंधन बनाया जाता है। भारत सरकार ने 2023 से E20 पेट्रोल को अनिवार्य कर दिया है, जिसमें 20% इथेनॉल मिला होता है। ब्राजील में E27 तक और अमेरिका में E10-E15 सबसे आम है। इथेनॉल का ऑक्टेन रेटिंग (octane rating) लगभग 109 होता है जो पेट्रोल (87-91) से कहीं अधिक है — इसलिए यह इंजन क्नॉकिंग (knocking) को रोकता है और इंजन के प्रदर्शन को बेहतर बनाता है।
- औद्योगिक उपयोग: साबुन, परफ्यूम, पेंट, वार्निश, डिटर्जेंट, प्लास्टिक, स्याही और कई रसायन बनाने में इथेनॉल को घोलक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। भारत में औद्योगिक इथेनॉल की मांग सालाना लगभग 400-500 मिलियन लीटर है।
- फार्मास्यूटिकल्स: दवाइयों, टॉनिक, एंटीसेप्टिक लिक्विड, सिरप और इंजेक्शन बनाने में इथेनॉल एक महत्वपूर्ण घटक है। 70% इथेनॉल सबसे अच्छा एंटीसेप्टिक माना जाता है।
- खाद्य पदार्थ: व्हिस्की, बीयर, वाइन, रम, वोदका आदि अल्कोहलयुक्त पेय बनाने में इथेनॉल मुख्य सामग्री है। भारत में शराब उद्योग सालाना लगभग 300-400 मिलियन लीटर इथेनॉल इस्तेमाल करता है।
- सेनेटाइजर: कोविड-19 महामारी के दौरान हैंड सेनेटाइजर की मांग अभूतपूर्व बढ़ी जिसमें 70% इथेनॉल मुख्य घटक है। भारत में 2020-21 में सेनेटाइजर के लिए अकेले 500 मिलियन लीटर से अधिक इथेनॉल इस्तेमाल हुआ।
क्यों ज़रूरी है इथेनॉल पर चर्चा करना?
आज दुनिया जलवायु परिवर्तन और जीवाश्म ईंधन के बढ़ते प्रदूषण से जूझ रही है। पेरिस समझौते (2015) के तहत दुनिया भर के देश कार्बन उत्सर्जन कम करने का प्रयास कर रहे हैं। इस संदर्भ में इथेनॉल को एक "ग्रीन फ्यूल" के रूप में प्रचारित किया जाता है। लेकिन क्या वास्तव में इथेनॉल उत्पादन पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल है? इसके उत्पादन में कितना पानी खर्च होता है? इससे नदियों, भूमिगत जल और ज़मीन पर क्या असर पड़ता है? खासकर खाली ज़मीन पर इथेनॉल की फैक्ट्री लगाने से क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं? नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 21 बड़े शहरों में 2025 तक ज़ीरो ग्राउंड वॉटर लेवल की स्थिति आ सकती है। ऐसे में यह समझना अत्यंत आवश्यक है।
⚠️ ध्यान दें: यह लेख एक संतुलित विश्लेषण है। यह न तो इथेनॉल का विरोध करता है और न ही अंध विश्वास से समर्थन। हमारा लक्ष्य है कि आपको पूरी जानकारी मिले ताकि आप स्वयं निर्णय ले सकें।
2. मक्का से इथेनॉल उत्पादन
1 किलो मक्का से कितना इथेनॉल बनता है? पूरी प्रक्रिया का विस्तृत विवरण
मक्का (Zea mays) दुनिया भर में इथेनॉल उत्पादन के लिए सबसे अधिक प्रयोग होने वाली फसल है। विशेषकर अमेरिका में, जहां लगभग 40% मक्के का उपयोग इथेनॉल बनाने में होता है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा मक्का उत्पादक भी है और सबसे बड़ा इथेनॉल उत्पादक भी — यह संयोग नहीं, बल्कि नीतिगत फैसलों का नतीजा है। 2005 में अमेरिकी सरकार ने रिन्यूएबल फ्यूल स्टैंडर्ड (RFS) लागू किया जिसमें इथेनॉल मिश्रण अनिवार्य किया गया। इसके बाद अमेरिका में मक्के की खेती और इथेनॉल फैक्ट्रियां तेजी से बढ़ीं। भारत में भी मक्का आधारित इथेनॉल उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। भारत में मक्के की उपज लगभग 30-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है जो अमेरिका (100+ क्विंटल) से कम है, लेकिन बेहतर बीजों और तकनीक से यह बढ़ रही है। भारत में मक्के की कुल उत्पादन लगभग 35 मिलियन टन सालाना है और इसमें से लगभग 5-8 मिलियन टन इथेनॉल के लिए उपलब्ध माना जाता है।
मक्के के दाने में लगभग 60-72% स्टार्च (starch) होता है। स्टार्च एक जटिल कार्बोहाइड्रेट है जो ग्लूकोज की लंबी श्रृंखलाओं से बना होता है। इसका रासायनिक सूत्र (C₆H₁₀O₅)ₙ है जहाँ n 200 से 2000 तक हो सकता है। इथेनॉल बनाने के लिए इस स्टार्च को पहले सरल शर्करा (glucose) में बदलना पड़ता है, फिर उस शर्करा को किण्वन द्वारा इथेनॉल में बदला जाता है। मक्के के दाने में इसके अलावा 8-10% प्रोटीन, 4-5% वसा, 2-3% फाइबर और 10-15% नमी होती है।
मक्के से इथेनॉल बनाने की सात चरणों की प्रक्रिया
चरण 1: सफाई और भिगोना (Cleaning & Steeping)
मक्के के दानों को साफ किया जाता है — मिट्टी, पत्ते, डंठल और अन्य अशुद्धियां हटाई जाती हैं। मैग्नेट से लोहे के कण भी निकाले जाते हैं। इसके बाद दानों को पानी में 12-24 घंटे तक भिगोया जाता है ताकि वे नरम हो जाएं। भिगोने के दौरान लगभग 1.2 लीटर पानी प्रति किलो मक्का उपयोग होता है। भिगोने के पानी में लैक्टिक एसिड या सल्फर डाइऑक्साइड मिलाया जाता है ताकि बैक्टीरिया न पनपें। स्टीपिंग के बाद पानी निकाल दिया जाता है और दाने फूलकर नरम हो जाते हैं।
चरण 2: पीसना (Grinding/Milling)
भीगे हुए दानों को पीसकर एक मोटा पेस्ट या "मैश" बनाया जाता है। इसे वेट मिलिंग या ड्राई मिलिंग से किया जा सकता है। इथेनॉल के लिए ज्यादातर ड्राई मिलिंग का प्रयोग होता है क्योंकि यह सस्ती और सरल है। ड्राई मिलिंग में पूरे दाने को हैमर मिल या रोलर मिल में पीस दिया जाता है। वेट मिलिंग में जर्म, फाइबर और स्टार्च को अलग-अलग किया जाता है, जिससे अधिक शुद्ध स्टार्च मिलता है लेकिन लागत 30-40% अधिक आती है।
चरण 3: स्टार्च का गलना (Liquefaction)
मक्के के पेस्ट में पानी मिलाकर गर्म किया जाता है। तापमान 85-90°C तक ले जाया जाता है। इस दौरान अल्फा-एमाइलेज़ एंजाइम मिलाया जाता है जो स्टार्च की लंबी श्रृंखलाओं को तोड़कर छोटे अणुओं — डेक्सट्रिन में बदल देता है। यह प्रक्रिया 1-2 घंटे तक चलती है। आधुनिक प्लांट में जेट कुकर का प्रयोग होता है जहाँ तापमान को 105-110°C तक ले जाकर तुरंत वापस लाया जाता है — इससे स्टार्च जल्दी गलता है और समय बचता है।
चरण 4: सैकेरिफिकेशन (Saccharification)
डेक्सट्रिन को ग्लूकोज में बदलने के लिए तापमान को 60-65°C तक लाया जाता है और ग्लूको-एमाइलेज़ एंजाइम मिलाया जाता है। यह एंजाइम स्टार्च की श्रृंखला को एक-एक करके तोड़ता है और ग्लूकोज अणु मुक्त करता है। यह प्रक्रिया 30-60 मिनट में पूरी होती है। अब मिश्रण में मीठी शर्करा होती है और इसका Brix लगभग 20-25 होता है। pH को 4.0-4.5 पर समायोजित किया जाता है।
चरण 5: किण्वन (Fermentation)
शर्करा युक्त घोल को 30-35°C तक ठंडा किया जाता है। इसमें यीस्ट (Saccharomyces cerevisiae) मिलाया जाता है — आमतौर पर प्रति लीटर घोल में 1-2 ग्राम यीस्ट। यीस्ट ग्लूकोज को खाकर इथेनॉल और CO₂ उत्पन्न करता है। यह प्रक्रिया 48-72 घंटे तक चलती है। किण्वन के बाद घोल में लगभग 8-12% इथेनॉल होता है। किण्वन के दौरान तापमान थोड़ा बढ़ता है — इसलिए कूलिंग की ज़रूरत होती है। आधुनिक प्लांट में Melle-Boinot प्रक्रिया का प्रयोग होता है जिसमें यीस्ट को रीसाइकिल किया जाता है।
चरण 6: आसवन (Distillation)
किण्वित घोल को आसवन टॉवर में भेजा जाता है। गर्म करने पर इथेनॉल (क्वथनांक 78.4°C) पहले वाष्पित होता है। इस वाष्प को ठंडा करके लगभग 90-95% शुद्धता वाला इथेनॉल प्राप्त होता है। आसवन में सबसे ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है — कुल का लगभग 40-50%। आधुनिक प्लांट में वेपर रीकम्प्रेशन और मल्टीपल इफेक्ट इवेपोरेटर का इस्तेमाल किया जाता है जिससे ऊर्जा बचत होती है।
चरण 7: डीहाइड्रेशन (Dehydration)
95% इथेनॉल को 99.5%+ "एनहाइड्रस इथेनॉल" में बदलने के लिए मॉलिक्यूलर सीव्स (3A टाइप) का प्रयोग किया जाता है। यह छोटे छिद्रों वाले कृत्रिम खनिज हैं जो पानी के अणुओं को अवशोषित कर लेते हैं लेकिन इथेनॉल को नहीं। इसकी ज़रूरत इसलिए होती है क्योंकि 95% इथेनॉल और पानी एक "ज़ीयोट्रोप" बनाते हैं — साधारण आसवन से इसे और शुद्ध नहीं किया जा सकता।
महत्वपूर्ण आंकड़ा: 1 किलो मक्के से लगभग 0.38 से 0.42 लीटर इथेनॉल बनता है। यानी 2.4 से 2.6 किलो मक्के से 1 लीटर इथेनॉल। एक हेक्टेयर मक्के (40 क्विंटल उपज) से लगभग 1500-1700 लीटर इथेनॉल बन सकता है।
उप-उत्पाद — DDGS
मक्के से इथेनॉल बनाने के बाद जो बचा हुआ ठोस पदार्थ होता है, उसे DDGS (Dried Distillers Grains with Solubles) कहते हैं। यह उत्कृष्ट पशु आहार है जिसमें 25-30% प्रोटीन, 10-12% वसा, 35-40% कार्बोहाइड्रेट होते हैं। प्रति लीटर इथेनॉल पर लगभग 0.8-1.0 किलो DDGS बनता है, जिसे ₹12-18 प्रति किलो बेचा जा सकता है। कई फैक्ट्रियों की कुल आय का 20-30% DDGS से आता है। भारत में DDGS की मांग तेजी से बढ़ रही है क्योंकि डेयरी और पोल्ट्री उद्योग बढ़ रहे हैं।
3. गन्ना से इथेनॉल उत्पादन
गन्ने के रस और मोलास से इथेनॉल — भारत का प्रमुख स्रोत
गन्ना भारत में इथेनॉल उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक देश है (ब्राजील के बाद) और यहां लगभग 500 से अधिक शक्कर मिलें हैं जो इथेनॉल भी बना सकती हैं। भारत में लगभग 340-370 शक्कर मिलें वास्तव में इथेनॉल डिस्टिलरी भी चलाती हैं। गन्ने से इथेनॉल बनाने की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भोजन सुरक्षा से सीधे टकराव में नहीं आता — क्योंकि मोलास शक्कर उत्पादन का उप-उत्पाद है, खुद एक अलग खाद्य पदार्थ नहीं। यही कारण है कि भारत सरकार ने गन्ना-मोलास आधारित इथेनॉल को प्राथमिकता दी है।
गन्ने से इथेनॉल बनाने के दो मुख्य तरीके हैं। पहला तरीका सीधे गन्ने के रस (cane juice) से है जो ब्राजील में मुख्य रूप से प्रयोग होता है। गन्ने के रस में 12-16% शर्करा (sucrose) होती है जो पहले से ही सरल रूप में है, इसलिए इसे सीधे किण्वित किया जा सकता है — स्टार्च को ग्लूकोज में बदलने की ज़रूरत नहीं पड़ती। दूसरा तरीका मोलास से है जो भारत में सबसे अधिक प्रयोग होने वाली विधि है। जब शक्कर मिल में गन्ने के रस से शक्कर क्रिस्टल बनाकर निकाल लिए जाते हैं, तो जो गाढ़ा तरल बचता है उसे मोलास कहते हैं। मोलास में लगभग 40-55% शर्करा होती है। एक टन गन्ने से लगभग 100-120 किलो शक्कर और 40-45 किलो मोलास बनता है। भारत में सालाना लगभभ 12-14 मिलियन टन मोलास बनता है।
सीधे रस से
10-14 kg
गन्ना = 1 लीटर इथेनॉल
मोलास से
3.3-4 kg
मोलास = 1 लीटर इथेनॉल
1 हेक्टेयर (रस से)
5000-7000 L
इथेनॉल प्रति हेक्टेयर
1 हेक्टेयर (मोलास से)
2500-3500 L
इथेनॉल प्रति हेक्टेयर
बैगास का महत्व
गन्ना कुचलने के बाद जो बचता है उसे बैगास कहते हैं। एक टन गन्ने से लगभग 280-320 किलो बैगास बनता है। बैगास में 40-50% नमी, 25-30% फाइबर और 15-20% सेल्युलोज़ होती है। बैगास से बिजली बनाना सबसे महत्वपूर्ण उपयोग है — लगभग हर शक्कर मिल में बैगास आधारित कोजनरेशन प्लांट होता है। एक टन बैगास से लगभग 400-500 किलोवाट घंटा बिजली बन सकती है। इसीलिए गन्ना-आधारित इथेनॉल का ऊर्जा अनुपात बहुत बेहतर होता है — अगर बैगास से बनी बिजली को भी गिनें तो यह 8:1 तक पहुंच जाता है। भारत में कुछ शक्कर मिलें बैगास से 2G इथेनॉल भी बनाने का प्रयास कर रही हैं। बैगास का अन्य उपयोग पेपर बनाना, प्लाईवुड, कंपोजिट बोर्ड और जैविक खाद बनाना भी है।
गन्ने से इथेनॉल — फायदे और नुकसान
✅ फायदे
- • शर्करा पहले से सरल रूप में — एंजाइम की ज़रूरत नहीं
- • किण्वन तेज़ी से (24-48 घंटे)
- • शक्कर मिलों के साथ प्लांट लगाना आसान
- • बैगास से बिजली — ऊर्जा अनुपात बेहतर
- • मोलास से बनने पर भोजन सुरक्षा पर असर नहीं
- • मौजूदा बुनियादी ढांचे का लाभ
❌ नुकसान
- • गन्ना सिर्फ उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगता है
- • बहुत अधिक पानी खाने वाली फसल (1500-2500 मिमी)
- • मोलास की उपलब्धता शक्कर उत्पादन पर निर्भर
- • गन्ने का रस जल्दी खराब होता है
- • 12-18 महीने की फसल — ज़मीन लंबे समय तक घेरती है
- • मिट्टी का अधिक क्षरण होता है
4. चावल से इथेनॉल उत्पादन
तोदी चावल और चावल की भूसी से इथेनॉल — एक अनूठा स्रोत
चावल से इथेनॉल बनाना एक अलग और दिलचस्प विषय है। चावल में लगभग 70-80% स्टार्च होता है, जो इसे इथेनॉल उत्पादन के लिए उपयुक्त बनाता है। वास्तव में, स्टार्च की मात्रा के लिहाज से चावल मक्के से भी बेहतर है। लेकिन खाने योग्य चावल से इथेनॉल बनाना विवादास्पद है क्योंकि यह भोजन सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। चावल दुनिया की आधी से अधिक आबादी का मुख्य भोजन है। भारत में चावल की खपत लगभग 120 मिलियन टन सालाना है। इसलिए ज्यादातर निम्न गुणवत्ता वाले चावल, तोदी चावल (broken rice) या चावल की भूसी (rice husk) से इथेनॉल बनाया जाता है।
तोदी चावल चावल मिलों में चावल की मिलिंग के दौरान बनता है। यह सामान्य चावल से छोटा और टूटा हुआ होता है। भारत में लगभग 8-12% चावल तोदी के रूप में बनता है — यानी सालाना लगभग 12-15 मिलियन टन तोदी चावल उपलब्ध है। तोदी चावल का बाजार मूल्य सामान्य चावल से 30-40% कम होता है — लगभग ₹15-20 प्रति किलो। इसे इथेनॉल में बदलने से किसानों और मिल मालिकों दोनों को बेहतर रिटर्न मिलता है। तोदी चावल से इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया मक्के के समान ही है — सफाई, भिगोना, जेलेटिनाइजेशन (भाप देकर पकाना), लिक्विफैक्शन, सैकेरिफिकेशन, किण्वन, आसवन और डीहाइड्रेशन। एक अंतर यह है कि चावल का स्टार्च मक्के के स्टार्च से थोड़ा अलग होता है — इसमें एमाइलोज़ की मात्रा 20-25% और एमाइलोपेक्टिन 75-80% होती है।
आंकड़ा: 1 किलो तोदी चावल से लगभग 0.40-0.45 लीटर इथेनॉल बनता है। यानी 2.2-2.5 किलो तोदी चावल से 1 लीटर इथेनॉल। चावल की भूसी से 1 किलो से लगभग 0.15-0.20 लीटर इथेनॉल (सेल्युलोज़िक विधि से)।
एफसीआई (FCI) का भंडारण — एक अवसर
भारत में खाद्य निगम के गोदामों में अक्सर बड़ी मात्रा में पुराना चावल जमा रहता है जो 2-3 साल से अधिक पुराना हो चुका होता है। इसका पोषण मूल्य कम हो जाता है और PDS में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सरकार ने 2018 में एक नीति बनाई जिसमें FCI के पुराने चावल को इथेनॉल बनाने के लिए दिया जा सकता है। यह एक बहुत अच्छा कदम है क्योंकि इससे एक तरफ चावल बर्बाद होने से बचता है और दूसरी तरफ इथेनॉल बनता है। लेकिन इसका दुरुपयोग भी हो सकता है — अगर अच्छे चावल को भी "पुराना" दिखाकर इथेनॉल में भेज दिया जाए तो भोजन सुरक्षा को नुकसान होगा। इस पर सख्त निगरानी ज़रूरी है।
चावल की भूसी से इथेनॉल — भविष्य की संभावना
चावल की भूसी में सेल्युलोज़ (35-40%) और हेमीसेल्युलोज़ (15-20%) होती है, सीधा स्टार्च नहीं। इसलिए इसे पहले प्रीट्रीटमेंट करके सेल्युलोज़ को खोलना पड़ता है, फिर सेल्युलोज़िक एंजाइम से शर्करा में बदलना पड़ता है। यह प्रक्रिया जटिल और महंगी है। भारत में सालाना लगभग 20-25 मिलियन टन चावल की भूसी बनती है। अगर इसका 50% भी इथेनॉल में बदला जाए तो लगभग 1500-2000 मिलियन लीटर इथेनॉल बन सकता है — बिना एक भी अतिरिक्त दाने इस्तेमाल किए। लेकिन अभी यह तकनीक व्यावसायिक स्तर पर परिपक्व नहीं है। IIT दिल्ली और ONGC ने मिलकर कुछ पायलट प्लांट लगाए हैं।
5. 1 लीटर इथेनॉल में कितना पानी लगता है?
पूरे उत्पादन श्रृंखला में जल उपयोग का विस्तृत विश्लेषण
यह इस ब्लॉग पोस्ट का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। जब लोग कहते हैं कि "1 लीटर इथेनॉल बनाने में इतना पानी लगता है", तो अक्सर वे केवल फैक्ट्री में लगने वाले पानी की बात करते हैं। लेकिन वास्तव में पानी तो फसल उगाने से लेकर अंतिम उत्पाद तक की पूरी श्रृंखला में खर्च होता है। इसे "जल पदचिह्न" (Water Footprint) कहते हैं। डच वैज्ञानिक अर्जेन होekstra ने इस अवधारणा को विकसित किया था।
जल पदचिह्न के तीन घटक
- हरा जल (Green Water): वर्षा का पानी जो फसल के विकास में उपयोग होता है — यह प्राकृतिक रूप से उपलब्ध होता है और इसे संजोकर नहीं रखा जा सकता।
- नीला जल (Blue Water): सिंचाई के लिए नदी, तालाब, भूमिगत जल या नहरों से लिया गया पानी — यही वह पानी है जिसकी कमी हम महसूस करते हैं।
- ग्रे जल (Grey Water): उत्पादन प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाले प्रदूषित पानी को साफ करने में जितना शुद्ध पानी लगेगा।
विस्तृत तुलनात्मक तालिका
| घटक | मक्का (लीटर) | गन्ना (लीटर) | चावल (लीटर) |
|---|---|---|---|
| खेती (हरा + नीला जल) | 1200-1800 | 1500-2500 | 2500-4000 |
| फैक्ट्री प्रक्रिया | 13-20 | 11-18 | 17-26 |
| ग्रे जल | 200-400 | 150-350 | 300-500 |
| कुल जल पदचिह्न | 1400-2200 | 1700-2900 | 2800-4500 |
🚨 चौंकाने वाला तथ्य: 1 लीटर पेट्रोल निकालने में लगभग 100-300 लीटर पानी लगता है, जबकि 1 लीटर इथेनॉल में 1400-4500 लीटर! यानी इथेनॉल पेट्रोल से 5 से 15 गुना अधिक पानी खर्च करता है!
फैक्ट्री में पानी कहाँ-कहाँ लगता है?
- भिगोने में: 3-4 लीटर — दानों को नरम करने के लिए
- लिक्विफैक्शन में: 2-3 लीटर — पेस्ट बनाने और गर्म करने में
- किण्वन में: 3-4 लीटर — यीस्ट घोल बनाने और तापमान नियंत्रण में
- आसवन में (कूलिंग): 3-5 लीटर — कंडेनसर में वाष्प को ठंडा करने में (सबसे ज्यादा)
- सफाई और अन्य: 2-4 लीटर — टैंक, पाइप, फ्लोर साफ करने में
रीसाइक्लिंग से बचत: आधुनिक प्लांट में जल रीसाइक्लिंग सिस्टम से फैक्ट्री में ताज़े पानी की खपत को 40-60% तक कम किया जा सकता है। लेकिन खेती का पानी रीसाइकिल नहीं हो सकता।
विभिन्न अध्ययनों के आंकड़े
- UNESCO-IHE (2012): वैश्विक स्तर पर 1 लीटर इथेनॉल का औसत जल पदचिह्न 2865 लीटर
- Water Footprint Network: मक्का-आधारित इथेनॉल का जल पदचिह्न 1400 लीटर (यूएसए) से 3500 लीटर (भारत/चीन)
- IISc बैंगलोर: भारतीय परिस्थितियों में गन्ना-आधारित इथेनॉल का जल पदचिह्न 2000-2500 लीटर
- CPCB रिपोर्ट: एक 100 KLD इथेनॉल फैक्ट्री प्रतिदिन 1500-2000 क्यूबिक मीटर (15-20 लाख लीटर) जल खर्च करती है
6. इथेनॉल के फायदे
पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से इथेनॉल के लाभ
6.1 पर्यावरणीय फायदे
पेट्रोल में 10% इथेनॉल मिलाने से कार्बन मोनोऑक्साइड उत्सर्जन में 25-30% कमी, हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में 15-20% कमी और PM2.5 उत्सर्जन में 20-25% कमी आती है। ये आंकड़े IOCL और CPCB के परीक्षणों से प्राप्त हैं। इथेनॉल में ऑक्सीजन होती है (लगभग 35% भार द्वारा) जो इंजन में ईंधन के पूर्ण दहन में मदद करती है। इथेनॉल से कोई सीस, सल्फर या बेंजीन नहीं निकलता — ये सभी पेट्रोल में मौजूद हानिकारक तत्व हैं। ब्राजील का अनुभव दिखाता है कि 40 सालों में इथेनॉल उपयोग से साओ पाउलो जैसे शहरों में वायु गुणवत्ता में सुधार हुआ है। लेकिन ध्यान रहे: इथेनॉल जलता है तो CO₂ निकलता है — लेकिन यह वही CO₂ है जो फसल ने बढ़ते समय अवशोषित किया था। नेट कार्बन बचत पेट्रोल से 30-60% अधिक होती है — 100% नहीं।
6.2 आर्थिक फायदे
इथेनॉल की मांग बढ़ने से मक्का, गन्ना, चावल की कीमतें बढ़ती हैं। 2020-2024 में गन्ने का FRP ₹275 से ₹315 प्रति क्विंटल तक बढ़ा। एक 100 KLD फैक्ट्री सीधे 100-150 लोगों को रोज़गार देती है। अप्रत्यक्ष रूप से यह संख्या 500-1000 तक जा सकती है। भारत हर साल ₹16-18 लाख करोड़ पेट्रोल आयात करता है। 20% ब्लेंडिंग से सालाना ₹30,000-35,000 करोड़ विदेशी मुद्रा बच सकती है। इथेनॉल प्लांट ग्रामीण क्षेत्रों में लगते हैं जिससे गांवों में आर्थिक गतिविधि बढ़ती है और युवाओं का पलायन रुकता है। शक्कर मिलों को सहारा मिलता है — जब शक्कर की कीमतें गिरती हैं तो मोलास से इथेनॉल बनाकर नुकसान की भरपाई कर सकती हैं।
6.3 ऊर्जा सुरक्षा
भारत अपनी तेल ज़रूरत का 85% से अधिक आयात करता है। EBP नीति का लक्ष्य 2025-26 तक 20% ब्लेंडिंग है। इथेनॉल का भंडारण आसान है और आपातकाल में रणनीतिक ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इथेनॉल कई स्रोतों से बन सकता है — मक्का, गन्ना, चावल, जौ, बाजरा, शर्करावल, फलों का रस, कचरा — यह विविधता आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाती है। फसल अवशेष को जलाने के बजाय इथेनॉल में बदलने से दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण कम हो सकता है — हर साल 20 मिलियन टन पराली जलाई जाती है।
7. इथेनॉल के नुकसान
जल, भूमि, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े नकारात्मक पहलू
7.1 जल संकट
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में गन्ने की खेती बढ़ने से भूमिगत जल स्तर तेजी से गिरा है। 2016 और 2019 में लातूर और बीड में पानी के लिए ट्रेन चलानी पड़ी — वहीं वहां कई शक्कर मिलें और इथेनॉल प्लांट लाखों लीटर पानी रोज़ इस्तेमाल कर रहे थे। यह क्रूर विडंबना है कि जहां लोग पीने का पानी नहीं पा रहे, वहीं फैक्ट्रियां ईंधन बनाने में पानी खर्च कर रही हैं। राजस्थान में भी गन्ने की खेती बढ़ने से चूरू, श्रीगंगानगर में भूजल स्तर गिरा है। कर्नाटक के कावेरी बेसिन में गन्ने की बढ़ती खेती से तीन राज्यों (कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल) के बीच पानी को लेकर संघर्ष बढ़ा है।
7.2 भोजन बनाम ईंधन विवाद
2008 का वैश्विक खाद्य संकट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अमेरिका में मक्के से इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से वैश्विक मक्के की कीमतें 70% बढ़ गईं। मेक्सिको में टॉर्टिला की कीमतें दोगुनी हो गईं। अफ्रीका के कई देशों में भुखमरी की स्थिति बनी। संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव बान की-मून ने कहा था "हमें गरीबों की प्लेट से ईंधन नहीं लेना चाहिए।" भारत में 2023 में चावल का निर्यात बंद करना पड़ा — ऐसे में चावल से इथेनॉल बनाना जोखिम भरा है।
7.3 भूमि उपयोग परिवर्तन और मिट्टी का क्षरण
इथेनॉल की मांग बढ़ने से किसान फसल चक्र बदलते हैं। दालें, तिलहन की जगह मक्का-गन्ना उगाने से दालों की कमी और कीमत वृद्धि होगी। भारत पहले से ही खाद्य तेल का सबसे बड़ा आयातक है। मोनोकल्चर से मिट्टी की गुणवत्ता घटती है, कीट-रोग बढ़ते हैं। गन्ने की खेती में मिट्टी का अधिक क्षरण होता है क्योंकि 12-18 महीने तक खेत में रहता है और भारी बारिश में मिट्टी बहती है। तीनों फसलें अधिक उर्वरक चाहने वाली हैं — नाइट्रेट जल भ्रष्टाचार बढ़ेगा और नाइट्रस ऑक्साइड (CO₂ से 300 गुना अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस) उत्सर्जन बढ़ेगा।
7.4 स्वास्थ्य संबंधी नुकसान
इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से इंजन में एसिटैल्डीहाइड (acetaldehyde) निकलता है जो कैंसरकारी है। E10-E20 से फॉर्मेल्डीहाइड का उत्सर्जन बढ़ सकता है — यह सांस की बीमारियों का कारण बनता है। गर्मियों में ज़मीनी स्तर के ऑज़ोन बढ़ सकता है जो फेफड़ों के लिए हानिकारक है। इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से अवैध शराब बनाना भी आसान हो जाता है — ज़हरीली शराब से होने वाली मौतें भारत में गंभीर समस्या है। हर साल सैकड़ों लोग ज़हरीली शराब से मरते हैं।
7.5 ऊर्जा संतुलन (Energy Balance)
इथेनॉल बनाने में जितनी ऊर्जा खर्च होती है, उसके मुकाबले इतनी मिलती भी है? मक्का इथेनॉल का ऊर्जा अनुपात 1.3:1 से 1.8:1 है। गन्ना इथेनॉल का 1.8:1 से 2.5:1 (बैगास से बिजली बनाने पर 8:1 तक)। चावल इथेनॉल का 1.2:1 से 1.5:1 — सबसे कम कुशल। तुलना में, पेट्रोल का ऊर्जा अनुपात 5:1 से 15:1 है। यानी इथेनॉल कम ऊर्जा-कुशल है।
8. नदी पर इथेनॉल का असर
इथेनॉल फैक्ट्रियों का अपशिष्ट जल नदियों पर क्या प्रभाव डालता है?
अपशिष्ट जल का स्वरूप
इथेनॉल फैक्ट्री से तीन प्रकार का अपशिष्ट जल निकलता है। सबसे खतरनाक है स्पेंट वॉश (Spent Wash) — मोलास से इथेनॉल बनाने के बाद बचा हुआ तरल। इसकी BOD 40,000-60,000 mg/L होती है (नदी में सामान्यतः 3-5 mg/L होनी चाहिए)। COD 80,000-1,20,000 mg/L। pH 3.5-4.5 (अत्यधिक अम्लीय)। रंग गाढ़ा भूरा-काला, गंध बहुत तीखी, तापमान 80-90°C। दूसरा है कूलिंग वॉटर — रासायनिक रूप से कम खतरनाक लेकिन तापीय प्रदूषण का कारण। तीसरा फ्लोर वॉटर और सफाई का पानी — जिसमें साबुन, तेल, ग्रीस होते हैं।
नदी में छोड़ने पर क्या होता है?
स्पेंट वॉश में बहुत अधिक कार्बनिक पदार्थ होते हैं। नदी में जाने पर जीवाणु इन्हें गलाने के लिए ऑक्सीजन खर्च करते हैं। इतनी ऑक्सीजन खपत होती है कि नदी में ऑक्सीजन का स्तर शून्य के करीब आ जाता है — "हाइपोक्सिया"। मछलियां, झींगे दम तोड़ देते हैं। 1 लीटर अनुपचारित स्पेंट वॉश लगभग 10,000 लीटर नदी के पानी को ऑक्सीजन-शून्य बना सकता है। शैवाल का अत्यधिक विकास (यूट्रोफिकेशन) होता है। जलीय पौधे नष्ट होते हैं। जल पक्षी पलायन करते हैं। जैव विविधता में भारी कमी आती है। पीने का पानी दूषित हो जाता है।
वास्तविक उदाहरण
- कर्नाटक: कृष्णा और कावेरी नदी के किनारे कई इथेनॉल और शक्कर मिलें हैं। रामनगरम में अक्सर मछलियों की मौत की खबरें आती हैं।
- महाराष्ट्र: भोगावती और वेन नदी में शक्कर मिलों का अपशिष्ट जाने से नदी का पानी काला हो गया है।
- उत्तर प्रदेश: गंगा की सहायक नदियों में शक्कर और इथेनॉल इकाइयों का अपशिष्ट जा रहा है।
- तमिलनाडु: कावेरी डेल्टा में इथेनॉल प्लांट्स का अपशिष्ट किसानों की सिंचाई का पानी दूषित कर रहा है।
कानूनी प्रावधान और वास्तविकता
CPCB ने स्पेंट वॉश को "17 श्रेणी का अत्यंत खतरनाक अपशिष्ट" में रखा है। शून्य तरल निर्वहन (ZLD) अनिवार्य है। स्पेंट वॉश को कम्पोस्टिंग में इस्तेमाल करना होता है। नदी में सीधे नहीं छोड़ा जा सकता। उल्लंघन पर ₹1 लाख से ₹5 करोड़ तक जुर्माना और जेल। लेकिन वास्तविकता कुछ और है — कई छोटे प्लांट ZLD का पालन नहीं करते। रात में गुपचुप अपशिष्ट नदी में छोड़ने की घटनाएं आम हैं। प्रवर्तन कमज़ोर है। नदियों की निगरानी के लिए ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम बहुत कम जगह लगे हैं।
9. भूमिगत जल पर इथेनॉल का असर
इथेनॉल उत्पादन श्रृंखला से भूजल स्तर पर क्या दबाव पड़ता है?
फसल उत्पादन से भूजल पर दबाव
गन्ना सबसे ज्यादा पानी खाने वाली फसलों में से एक है। 12-18 महीने में एक हेक्टेयर गन्ना 20,000-30,000 घन मीटर पानी खर्च करता है। जहां बारिश कम होती है, वहां यह पानी भूमिगत जल से आता है। मक्का 5000-8000 घन मीटर प्रति हेक्टेयर। चावल सबसे अधिक — 25,000-50,000 घन मीटर प्रति हेक्टेयर, जिसमें बड़ा हिस्सा भूजल से। भारत में कुल सिंचाई का 60% से अधिक भूजल पर निर्भर है। CGWB के अनुसार 256 ज़िले "अति-उपयोगित" श्रेणी में हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु के कई इलाकों में भूजल स्तर सालाना 1-3 मीटर गिर रहा है।
फैक्ट्री से भूजल पर असर
एक 100 KLD प्लांट प्रतिदिन 1500-2000 क्यूबिक मीटर भूजल निकालता है — सालाना 5.5-7.3 लाख क्यूबिक मीटर। कई फैक्ट्रियां अवैध रूप से गहरे बोरवेल लगाती हैं। CGWB से अनुमति लेना अनिवार्य है लेकिन अनुपालन कम है। अगर स्पेंट वॉश ज़मीन में रिसता है, तो भूमिगत जल दूषित हो सकता है — भारी धातुएं, कार्बनिक अशुद्धियां भूजल तक पहुंचती हैं। भूजल दूषित होने पर साफ करना लगभग असंभव और अत्यंत महंगा है — कभी-कभी हज़ारों साल लगते हैं प्राकृतिक रूप से साफ होने में।
भूजल स्तर गिरने के परिणाम
- सूखे बोरवेल: किसानों के पुराने बोरवेल सूख जाते हैं, नए गहरे बोरवेल अधिक खर्चीले
- फ्लोराइड और आर्सेनिक: भूजल स्तर गिरने पर ये ज़हरीले तत्व बढ़ते हैं — हड्डियों, त्वचा को नुकसान
- झरने सूखना: भूजल गिरने से झरनों का प्रवाह रुकता है, नदियों का आधार प्रवाह कम होता है
- भूमि धंसना: अत्यधिक भूजल निकासी से दिल्ली, राजस्थान में ज़मीन धंसने लगती है
10. भूमि/ज़मीन पर इथेनॉल का असर
इथेनॉल फैक्ट्री और इससे जुड़ी खेती से ज़मीन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
फैक्ट्री से सीधा असर
एक 100 KLD प्लांट के लिए 2-5 एकड़ ज़मीन चाहिए। बड़े प्लांट (500 KLD) के लिए 10-15 एकड़। फैक्ट्री निर्माण और भारी वाहनों से मिट्टी संकुचित हो जाती है — संकुचित मिट्टी में पानी नहीं रुकता, जड़ें नहीं फैलतीं। फैक्ट्री से रिसने वाले रसायन मिट्टी को दूषित कर सकते हैं — इथेनॉल मिट्टी में मिलने से सूक्ष्मजीवों का संतुलन बिगड़ता है, अम्लीय स्पेंट वॉश से pH गिर सकता है, भारी धातुएं जमा हो सकती हैं। कंक्रीट से ज़मीन सील हो जाती है — बारिश का पानी मिट्टी में नहीं उतर पाता, भूजल रिचार्ज रुकता है।
फसल उत्पादन से ज़मीन पर असर
इथेनॉल की मांग बढ़ने से मोनोकल्चर होता है — एक ही फसल बार-बार उगाने से मिट्टी में विशिष्ट पोषक तत्वों की कमी, कीट-रोग बढ़ना, प्राकृतिक उर्वरता घटना। अधिक उर्वरकों से मिट्टी कार्बन घटता है, जल धारिता कम होती है, प्राकृतिक नाइट्रोजन स्थिरक जीवाणुओं की संख्या घटती है। गन्ना काटने के बाद जल्दी जुताई से मिट्टी का क्षरण बढ़ता है। मिट्टी की जैविक गतिविधि रुक जाती है।
सामाजिक असर
इथेनॉल फैक्ट्री आने से ज़मीन की कीमतें बढ़ जाती हैं। छोटे किसान अपनी ज़मीन बेच देते हैं। कर्मचारियों के लिए आवास बनता है — कृषि भूमि कम होती जाती है। गांव का चरित्र बदल जाता है — कृषि-प्रधान से औद्योगिक। भूमिहीन मजदूरों की संख्या बढ़ती है। ज़मीन की असमानता बढ़ती है। ग्राम सभाओं की सहमति के बिना भी कभी-कभी फैक्ट्रियां लगा दी जाती हैं — यह लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है।
11. खाली ज़मीन पर इथेनॉल का नुकसान
खाली/बंजर ज़मीन पर फैक्ट्री लगाने और ईंधन फसलें उगाने से क्या-क्या नुकसान होता है?
सरकारें अक्सर कहती हैं "खाली ज़मीन पर इथेनॉल फैक्ट्री लगाए जाएंगे" — लेकिन वास्तव में "खाली ज़मीन" वास्तव में खाली नहीं होती। भारत में लगभग 55 मिलियन हेक्टेयर बंजर/पथरीली ज़मीन है। लेकिन "बंजर" की परिभाषा भ्रामक है — कुछ बंजर ज़मीनें चरागाह हैं जहां पशु चरते हैं, कुछ वन क्षेत्र के किनारे की हैं — वन्यजीवों के गतिमार्ग, कुछ में स्थानीय वनस्पति है जो मिट्टी को बचाए हुए हैं, कुछ ज़मीनें आदिवासियों की सामूहिक हैं।
खाली ज़मीन पर फैक्ट्री लगाने के नुकसान
पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश: "खाली" ज़मीन पर भी कोई-न-कोई पारिस्थितिकी तंत्र होता है — कीट-पतंगे, छिपकलियां, सांप, बाज़, स्थानीय पौधे जो मिट्टी को बांधे हुए हैं। फैक्ट्री बनने से ये सब नष्ट हो जाते हैं।
मिट्टी की संरचना नष्ट होना: खाली/बंजर ज़मीन की मिट्टी पहले से ही कमज़ोर होती है। फैक्ट्री निर्माण में जेसीबी, पोकलेन से मिट्टी की ऊपरी उर्वर परत हटा दी जाती है (topsoil removal)। कंक्रीट से मिट्टी पूरी तरह सील हो जाती है। बारिश का पानी मिट्टी में नहीं उतर पाता — भूजल रिचार्ज रुक जाता है। आसपास की ज़मीन पर बाढ़ का खतरा बढ़ता है।
जल निकासी बदलना: खाली ज़मीन अक्सर प्राकृतिक जल निकासी का काम करती है। फैक्ट्री बनने से बारिश का पानी रुककर आसपास के खेतों में बाढ़ ला सकता है, नमी का स्तर बदल सकता है, आसपास के कुएं सूख सकते हैं।
ध्वनि और वायु प्रदूषण: 24 घंटे मशीनों की आवाज़ — ध्वनि प्रदूषण। इथेनॉल की गंध — सांस की बीमारियां। CO₂ और अन्य गैसें — वायु प्रदूषण। ट्रकों का आना-जाना — धूल और शोर।
भूमि अधिग्रहण: सरकार अक्सर "खाली ज़मीन" के नाम पर किसानों की ज़मीन अधिग्रहित करती है। मुआवज़ा कम मिलता है, पुनर्वास अपर्याप्त होता है, कई बार "खाली" का दर्ज़ा गलत तरीके से दिया जाता है।
खाली ज़मीन पर ईंधन फसलें उगाने के नुकसान
बंजर ज़मीन पर ये फसलें आसानी से नहीं उगतीं: मक्का, गन्ना और चावल अच्छी मिट्टी, पानी और उर्वरक चाहने वाली फसलें हैं। बंजर ज़मीन पर उपज 30-40% कम होगी। इसके लिए अधिक उर्वरक और पानी चाहिए — और अधिक खर्च।
मिट्टी और बिगड़ेगी: बंजर ज़मीन में पहले से कम जैविक पदार्थ होता है। भारी उर्वरक डालने से जो थोड़ी बहुत जैविकता बची है, वह नष्ट हो जाएगी। एक बार मिट्टी पूरी तरह "थक" जाने पर ठीक करने में दशकों लग सकते हैं।
पानी का अतिरिक्त दबाव: बंजर ज़मीन अक्सर ऐसे क्षेत्रों में होती है जहां पानी की कमी है। इन फसलों को सिंचाई के लिए भूमिगत जल का इस्तेमाल करना पड़ेगा — जो पहले से ही घट रहा है।
स्वदेशी वनस्पति का विनाश: बंजर ज़मीन पर भी कुछ स्थानीय पौधे और घासें होती हैं जो मिट्टी को बचाए हुए हैं। इन्हें हटाकर ईंधन फसल लगाने से पहली बा रिश में ही ऊपरी मिट्टी बह सकती है। पहली बारिश में टॉप सॉइल बहकर नज़दीकी नालों और नदियों में चला जाएगा — जिससे नदियों में गाद (silt) बढ़ेगी और जलाशयों की उम्र कम होगी।
आग का खतरा
इथेनॉल अत्यंत ज्वलनशील (highly flammable) है। इसका फ्लैश पॉइंट केवल 13°C है — यानी 13°C से ऊपर के तापमान में यह आसानी से आग पकड़ सकता है। खाली ज़मीन पर फैक्ट्री होने से आग लगने की स्थिति में बचाव कठिन होता है — दूर फैक्ट्री, कम दमकल व्यवस्था। आसपास की खाली/सूखी ज़मीन पर आग फैलने का खतरा रहता है। विस्फोट की स्थिति में आसपास के गांवों को खतरा हो सकता है। भारत में कई औद्योगिक दुर्घटनाओं में इथेनॉल स्टोरेज से आग लगने की घटनाएं हुई हैं। बीड़ी, सिगरेट या बिजली की चिंगारी से भी आग लग सकती है। खाली ज़मीन पर फैक्ट्री के चारों ओर आग-रोधी दीवार और सुरक्षा गलियां बनाना ज़रूरी है लेकिन कई छोटे प्लांट में यह नहीं होता। बीमा कवर भी अक्सर अपर्याप्त होता है।
वैकल्पिक समाधान — खाली ज़मीन पर क्या बेहतर होगा?
कुछ ऐसी फसलें हैं जो बंजर ज़मीन पर भी उग सकती हैं और इथेनॉल भी दे सकती हैं। स्वीट सॉर्गम (Sweet Sorghum) एक सूखा सहन करने वाली फसल है, कम पानी में उगती है, और इसके डंठल में शर्करा होती है — 1 हेक्टेयर से 2000-3000 लीटर इथेनॉल। मिस्केंथस (Miscanthus) एक घास है जो बंजर ज़मीन पर उग सकती है और सेल्युलोज़िक इथेनॉल के लिए उपयुक्त है। जाट्रोफा (Jatropha) के बीजों से बायोडीज़ल बनता है — बंजर ज़मीन पर उग सकता है। इक्कल (Agave) में बहुत अधिक स्टार्च होता है — मेक्सिको में सूखे क्षेत्रों में उगाया जाता है। लेकिन ये सब अभी शोध और विकास के चरण में हैं — व्यावसायिक स्तर पर मक्का, गन्ना और चावल की तरह स्थापित नहीं हैं। सबसे अच्छा विकल्प यह होगा कि खाली ज़मीन पर पेड़ लगाए जाएं — वृक्षारोपण से मिट्टी बचेगी, भूजल रिचार्ज होगा, कार्बन सीवेस्ट्रेशन होगा, और पर्यावरण को लाभ होगा — बिना किसी नुकसान के।
12. तीनों स्रोतों का तुलनात्मक विश्लेषण
मक्का, गन्ना और चावल — कौन सबसे अच्छा इथेनॉल स्रोत है?
इस खंड में हम तीनों स्रोतों का व्यापक तुलनात्मक विश्लेषण करेंगे। यह तुलना केवल उपज और लागत तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक सभी पहलुओं को शामिल करती है। कोई भी एक स्रोत "सबसे अच्छा" नहीं है — हर एक के अपने फायदे और नुकसान हैं। यह तुलना भारतीय संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक है क्योंकि भारत की जल, भूमि और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियां अद्वितीय हैं।
| पैरामीटर | मक्का | गन्ना | चावल |
|---|---|---|---|
| 1 लीटर के लिए कच्चा माल (kg) | 2.4-2.6 | 3.3-4 (मोलास) | 2.2-2.5 (तोदी) |
| कुल जल पदचिह्न (L/L) | 1400-2200 | 1700-2900 | 2800-4500 |
| फैक्ट्री जल (L/L) | 13-20 | 11-18 | 17-26 |
| ऊर्जा अनुपात | 1.3-1.8:1 | 1.8-8:1 | 1.2-1.5:1 |
| 1 हेक्टेयर से (L) | 1500-1700 | 2500-7000 | 200-250 |
| उप-उत्पाद | DDGS | बैगास + DDGS | DDGS |
| भोजन सुरक्षा पर असर | उच्च | कम | मध्यम |
| जल दबाव | मध्यम | उच्च | अत्यधिक |
| नदी पर असर | मध्यम | उच्च | मध्यम |
| भूजल पर असर | मध्यम | उच्च | अत्यधिक |
| लागत प्रति लीटर | ₹55-65 | ₹45-55 | ₹60-70 |
| समग्र रेटिंग | ⭐⭐⭐ | ⭐⭐⭐⭐ | ⭐⭐ |
निष्कर्ष: भारतीय संदर्भ में गन्ना-मोलास आधारित इथेनॉल सबसे अच्छा विकल्प है क्योंकि भोजन सुरक्षा पर असर नहीं, बैगास से बिजली बनाकर ऊर्जा अनुपात बेहतर होता है, और मौजूदा शक्कर मिलों का बुनियादी ढांचा उपलब्ध है। लेकिन सावधानी: गन्ने की खेती बढ़ाने से जल संकट गंभीर होगा — यह गंभीर चिंता है।
विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण — मक्का
मक्का से इथेनॉल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसकी खेती भारत में लगभग हर राज्य में हो सकती है — यह उष्णकटिबंधीय फसल नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक — सब जगह मक्का उगता है। इसकी उपज भी अच्छी है और बढ़ रही है। DDGS उप-उत्पाद का बाजार भी बढ़ रहा है। लेकिन सबसे बड़ा नुकसान भोजन सुरक्षा पर असर है — मक्का गरीबों का भोजन है (मक्के की रोटी) और पशु आहार भी। अगर इथेनॉल के लिए मक्का खरीदने लगें तो कीमतें बढ़ेंगी और गरीबों पर दबाव पड़ेगा। इसके अलावा मक्का भी मध्यम-अधिक पानी की फसल है — अगर सिंचाई पर निर्भर हो तो भूजल पर दबाव बढ़ेगा। ऊर्जा अनुपात भी गन्ने से कम है।
विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण — गन्ना
गन्ना-मोलास इथेनॉल की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह भोजन से टकराव नहीं करता — मोलास तो शक्कर बनाने के बाद बचने वाला कचरा है। बैगास से बिजली बनाने से ऊर्जा अनुपात बहुत बेहतर हो जाता है — यह गन्ने को सबसे कुशल इथेनॉल स्रोत बनाता है। मौजूदा शक्कर मिलों में इथेनॉल प्लांट लगाना आसान है — अतिरिक्त भूमि की ज़रूरत नहीं, बिजली बैगास से, श्रम उपलब्ध। लागत भी सबसे कम (₹45-55 प्रति लीटर)। लेकिन नुकसान भी कम नहीं — गन्ना सबसे ज्यादा पानी खाने वाली फसलों में से एक है। भारत में गन्ने की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु में होती है — और ये सभी राज्य जल संकट से जूझ रहे हैं। गन्ने की खेती से मिट्टी का क्षरण भी सबसे अधिक होता है। गन्ने से निकलने वाला स्पेंट वॉश सबसे ज़हरीला अपशिष्ट है।
विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण — चावल
चावल से इथेनॉल का सबसे बड़ा नुकसान जल पदचिह्न है — 2800-4500 लीटर प्रति लीटर, जो तीनों में सबसे अधिक है। चावल की खेती में सबसे ज्यादा पानी लगता है (1 किलो चावल के लिए 3000-5000 लीटर)। ऊर्जा अनुपात भी सबसे कम (1.2-1.5:1)। तोदी चावल से 1 हेक्टेयर से केवल 200-250 लीटर इथेनॉल बनता है जो सबसे कम है। लागत भी सबसे अधिक। लेकिन तोदी चावल और FCI के पुराने चावल का उपयोग इसे कुछ हद तक व्यावहारिक बनाता है — क्योंकि ये अन्यथा बर्बाद होते। चावल की भूसी से 2G इथेनॉल की संभावना भविष्य में चावल को अधिक आकर्षक बना सकती है — लेकिन यह तकनीक अभी तैयार नहीं है। भोजन सुरक्षा का जोखिम भी चावल में सबसे अधिक है — क्योंकि चावल भारत का मुख्य भोजनान्न है।
13. भारत में इथेनॉल नीति
राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति, ब्लेंडिंग लक्ष्य और वर्तमान स्थिति
एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (EBP) — समयरेखा
भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग की यात्रा 2003 में शुरू हुई जब पहली बार 5% ब्लेंडिंग (E5) का लक्ष्य रखा गया। लेकिन यह लक्ष्य कई कारणों से पूरा नहीं हो पाया — इथेनॉल की कम उपलब्धता, अनियमित आपूर्ति, राज्य सरकारों की अनिच्छा (कुछ राज्यों में शराबबंदी), और तेल कंपनियों की कम दिलचस्पी। 2018 में 10% ब्लेंडिंग (E10) का लक्ष्य रखा गया और कुछ राज्यों में इसे हासिल भी किया गया। 2021 में प्रधानमंत्री ने 2025 तक 20% ब्लेंडिंग (E20) का लक्ष्य घोषित किया — यह एक बहुत महत्वाकांक्षी लक्ष्य था। अप्रैल 2023 से E20 पेट्रोल की शुरुआत हुई। अप्रैल 2024 तक वास्तविक ब्लेंडिंग दर लगभग 12-15% थी — लक्ष्य से पीछे लेकिन तेजी से बढ़ती हुई। दिसंबर 2024 तक यह लगभग 16-18% तक पहुंच गई है।
राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति 2018
इस नीति के मुख्य बिंदु हैं: 2025 तक 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग, 2030 तक 20% बायोडीज़ल ब्लेंडिंग, कचरे से ईंधन (Waste-to-Energy) पर जोर, और सबसे महत्वपूर्ण — द्वितीय पीढ़ी (2G) इथेनॉल पर ध्यान। 2G इथेनॉल वह है जो खाद्य अनाज से नहीं, बल्कि कृषि अवशेष से बनता है — गन्ने की भूसी, चावल की भूसी, गेहूं का भूसा, फसल अवशेष। इसका सबसे बड़ा फायदा है कि भोजन सुरक्षा पर कोई असर नहीं, फसल जलाने (stubble burning) की समस्या समाधान, और अतिरिक्त ज़मीन नहीं चाहिए। लेकिन 2G तकनीक अभी महंगी है — लागत ₹80-100 प्रति लीटर जबकि 1G (मोलास/अनाज से) ₹45-65। सरकार 2G के लिए ₹20 प्रति लीटर अतिरिक्त सहायता दे रही है।
सरकारी सहायता और प्रोत्साहन
इथेनॉल के लिए एकीकृत मूल्य नीति है — वर्तमान में मोलास से ₹56.58 प्रति लीटर और अनाज से ₹65.63 प्रति लीटर (2024-25 के लिए)। 2G इथेनॉल के लिए अतिरिक्त ₹20.19 प्रति लीटर सहायता। इसके अलावा ब्याज में छूट वाले ऋण, आबकारी ड्यूटी में छूट, परिवहन लागत में सहायता, और इथेनॉल प्लांट लगाने के लिए भूमि आवंटन में सुविधा भी दी जाती है। GST पर भी इथेनॉल को विशेष दर पर रखा गया है। कई राज्य सरकारें इथेनॉल प्लांट के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दे रही हैं — जैसे बिजली दर में छूट, स्टाम्प ड्यूटी में छूट, और एकल खिड़की प्रणाली (single window clearance)।
राज्यवार स्थिति
उत्तर प्रदेश सबसे अधिक शक्कर मिलें (150+) वाला राज्य है और इथेनॉल उत्पादन में अग्रणी है। महाराष्ट्र दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है लेकिन जल संकट गंभीर है — यहां कुछ ज़िलों में नए इथेनॉल प्लांट लगाने पर रोक लगी है। कर्नाटक तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है लेकिन कावेरी जल विवाद के कारण गन्ने की खेती पर प्रतिबंध होता रहा है। बिहार में नीतीश कुमार ने शराबबंदी के बाद इथेनॉल प्लांट पर रोक लगा दी है — हालांकि यह विवादास्पद है क्योंकि औद्योगिक इथेनॉल और शराब अलग हैं। तमिलनाडु में गन्ना उत्पादक है लेकिन जल संकट और कावेरी विवाद। गुजरात में इथेनॉल उत्पादन बढ़ रहा है — यहां मक्का और गन्ना दोनों से इथेनॉल बनता है। मध्य प्रदेश में मक्का आधारित प्लांट बढ़ रहे हैं।
14. वैश्विक परिप्रेक्ष्य
दुनिया भर में इथेनॉल उत्पादन का वर्तमान दृश्य
दुनिया भर में सालाना लगभग 110-120 बिलियन लीटर इथेनॉल का उत्पादन होता है। अमेरिका और ब्राजील मिलकर वैश्विक उत्पादन का लगभग 80-85% हिस्सा रखते हैं। यूरोपीय संघ, चीन, भारत, कनाडा और थाईलैंड अन्य प्रमुख उत्पादक हैं। अमेरिका में मक्का आधारित इथेनॉल (लगभग 60 बिलियन लीटर) हावी है, ब्राजील में गन्ना आधारित (लगभग 30 बिलियन लीटर)। यूरोप में गेहूं, जौ और चुकंदर से इथेनॉल बनता है। चीन में चावल और गेहूं आधारित इथेनॉल है लेकिन हाल में चीन ने खाद्य सुरक्षा के कारण अनाज-आधारित इथेनॉल पर रोक लगा दी है और 2G पर ध्यान केंद्रित किया है।
| देश | वार्षिक उत्पादन (बिलियन L) | प्रमुख फसल | ब्लेंडिंग दर |
|---|---|---|---|
| अमेरिका | ~60 | मक्का | E10-E15 |
| ब्राजील | ~30 | गन्ना | E27 (Flex) |
| यूरोपीय संघ | ~6 | गेहूं, जौ | E5-E10 |
| चीन | ~4 | चावल, गेहूं | E10 (कुछ प्रांतों में) |
| भारत | ~5-6 | गन्ना (मोलास) | E12-E18 |
| थाईलैंड | ~1.5 | गन्ना, तोदी चावल | E10-E20 |
| कनाडा | ~2 | मक्का, गेहूं | E5-E10 |
ब्राजील — विश्व इथेनॉल का गुरु
ब्राजील 1970 के तेल संकट के बाद से इथेनॉल पर गंभीरता से काम कर रहा है। प्रोएकोल (ProAlcool) कार्यक्रम दुनिया का सबसे सफल जैव-ईंधन कार्यक्रम माना जाता है। ब्राजील में लगभग 40% गाड़ियां "फ्लेक्स फ्यूल" (Flex Fuel) हैं — यानी ये 100% पेट्रोल या 100% इथेनॉल या दोनों का कोई भी मिश्रण चला सकती हैं। ब्राजील में गन्ने का रस सीधे इथेनॉल में बदला जाता है — मोलास नहीं। इससे उपज बेहतर होती है। बैगास से बिजली और गर्मी भी बनती है — कई मिलें "ऊर्जा आत्मनिर्भर" हैं। लेकिन ब्राजील में भी समस्याएं हैं — अमेज़न वनों की कटाई गन्ने की खेती के लिए, मजदूरों के शोषण की खबरें, और गन्ने की खेती से मिट्टी का क्षरण।
अमेरिका — इथेनॉल उद्योग का दिग्गज
अमेरिका में इथेनॉल उद्योग मुख्य रूप से मक्का आधारित है। 2005 के RFS कानून के बाद यह तेजी से बढ़ा। अमेरिका में लगभग 200 इथेनॉल प्लांट हैं ज्यादातर मध्यपश्चिमी राज्यों (Iowa, Nebraska, Illinois) में। यहां की बहस भी भयंकर है — पर्यावरणविद कहते हैं कि मक्के की खेती से जल प्रदूषण, मिट्टी क्षरण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ रहा है। खाद्य सुरक्षा के अधिवक्ता कहते हैं कि मक्के की कीमतें बढ़ने से गरीबों को नुकसान हो रहा है। इथेनॉल उद्योग कहता है कि वे DDGS उप-उत्पाद दे रहे हैं जो पशु आहार के रूप में काम आता है — तो "नुकसान" इतना नहीं है। EPA (Environmental Protection Agency) के अनुसार मक्का इथेनॉल से पेट्रोल के मुकाबले 20-40% कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होता है — लेकिन कुछ स्वतंत्र अध्ययनों का कहना है कि जब भूमि उपयोग परिवर्तन (ILUC — Indirect Land Use Change) को भी गिनें तो यह लाभ बहुत कम या शून्य हो जाता है।
यूरोप — सतर्क दृष्टिकोण
यूरोपीय संघ ने इथेनॉल को लेकर सबसे सतर्क दृष्टिकोण अपनाया है। 2018 की रिन्यूएबल एनर्जी डायरेक्टिव (RED II) में यह तय किया गया कि 2023 से खाद्य आधारित बायोफ्यूल को "उन्नत बायोफ्यूल" (advanced biofuel) के रूप में गिना नहीं जाएगा। यानी खाद्य अनाज से बने इथेनॉल को कोटा से बाहर रखा गया — केवल अपशिष्ट और कृषि अवशेष से बने बायोफ्यूल को ही प्रोत्साहन दिया जाएगा। यह नीति भोजन बनाम ईंधन बहस का परिणाम है। यूरोप ने ILUC कारक को भी शामिल किया — अगर इथेनॉल के लिए ज़मीन का उपयोग बदला जाता है तो उसका कार्बन लागत भी गिना जाएगा। यूरोप का यह मॉडल भारत के लिए भी सीख देने वाला है।
15. निष्कर्ष और सुझाव
संतुलित दृष्टिकोण — इथेनॉल का भविष्य कैसा होना चाहिए?
इस विस्तृत विश्लेषण के बाद कुछ निष्कर्ष स्पष्ट होते हैं। इथेनॉल न तो पूरी तरह "ग्रीन" है और न ही पूरी तरह "खराब" — यह एक जटिल विषय है जिसके कई पहलू हैं। इस पर सही निर्णय के लिए सभी पहलुओं को समझना ज़रूरी है।
प्रमुख निष्कर्ष
1. पानी का सबसे बड़ा सवाल: 1 लीटर इथेनॉल बनाने में 1400-4500 लीटर पानी लगता है — यह अस्वीकरणीय रूप से अधिक है। भारत जैसे जल-संकटग्रस्त देश में यह सबसे बड़ी चिंता है। पेट्रोल से 5-15 गुना अधिक पानी खर्च करने वाला "ग्रीन फ्यूल" वास्तव में कितना ग्रीन है — यह प्रश्न गंभीर है।
2. भोजन सुरक्षा का जोखिम: अगर भविष्य में अनाज-आधारित इथेनॉल बढ़ाया गया तो भोजन की कीमतें बढ़ेंगी। 2008 का वैश्विक खाद्य संकट एक चेतावनी है। भारत में चावल और मक्का दोनों को लेकर सतर्क रहना होगा।
3. गन्ना-मोलास सबसे अच्छा वर्तमान विकल्प: भोजन सुरक्षा पर असर नहीं, बैगास से बिजली, मौजूदा ढांचा, कम लागत — लेकिन गन्ने की खेती से जल संकट और गंभीर होगा। इसलिए गन्ने की खेती बढ़ाने पर नियंत्रण ज़रूरी है।
4. नदियों को ज़हरीला बनाना अक्षम्य: स्पेंट वॉश से नदियों का विनाश एक ऐसा नुकसान है जिसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। ZLD को सख्ती से लागू करना होगा और अवैध निस्तारण पर कड़ी सज़ा होनी चाहिए।
5. खाली ज़मीन कोई समाधान नहीं: "खाली ज़मीन पर फैक्ट्री" का नारा भ्रामक है। खाली ज़मीन भी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। उस पर फैक्ट्री लगाने से मिट्टी, जल और वन्यजीवों को नुकसान होता है।
6. 2G इथेनॉल ही भविष्य: कृषि अवशेष, फसल का कचरा, भूसी से बनने वाला इथेनॉल ही सच में "ग्रीन" है — न भोजन से टकराव, न अतिरिक्त ज़मीन, न अतिरिक्त पानी। लेकिन तकनीक अभी महंगी है — इस पर शोध और निवेश की ज़रूरत है।
हमारे सुझाव
1 जल-कुशल क्षेत्रों में ही इथेनॉल प्लांट लगाएं
जहां भूजल स्तर सुरक्षित है और बारिश पर्याप्त है, वहीं प्लांट लगाएं। जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों (मराठवाड़ा, बीकानेर, रायलसीमा आदि) में नए प्लांट पर रोक लगाएं। प्रत्येक प्लांट के लिए जल-प्रभाव मूल्यांकन (Water Impact Assessment) अनिवार्य करें।
2 2G इथेनॉल पर प्राथमिकता दें
भविष्य की नीति केवल 2G पर केंद्रित होनी चाहिए। फसल अवशेष (stubble), भूसी, बायोमास से इथेनॉल बनाने पर शोध बढ़ाएं। 2G के लिए सहायता बढ़ाएं — वर्तमान ₹20 से ₹30-35 प्रति लीटर तक। 2030 तक 2G को 1G से बराबरी का बनाने का लक्ष्य रखें।
3 ZLD को सच में लागू करें
स्पेंट वॉश का शून्य तरल निर्वहन सख्ती से लागू करें। ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम लगाएं — प्रत्येक प्लांट के निकास बिंदु पर ऑनलाइन BOD/COD सेंसर। उल्लंघन पर तत्काल प्लांट बंद करने की शक्ति दें — न केवल जुर्माना। नदियों के किनारे इथेनॉल प्लांट पर पूर्ण प्रतिबंध लगाएं।
4 भोजन सुरक्षा की दीवार बनाएं
एक स्पष्ट नीति बनाएं कि अनाज-आधारित इथेनॉल कोई सीमा से अधिक नहीं होगा — उदाहरण के लिए कुल उत्पादन का 15% से अधिक नहीं। खाद्यान्न की कीमतों पर नज़र रखने वाली एक समिति बनाएं — अगर कीमतें सीमा से ऊपर जाएं तो इथेनॉल के लिए अनाज आवंटन रोक दिया जाए।
5 फसल चक्र विविधता बनाए रखें
इथेनॉल के लिए किसी एक फसल पर अधिक निर्भरता न बनाएं। मक्का, गन्ना, चावल — तीनों से इथेनॉल बनाएं लेकिन संतुलन बनाए रखें। स्वीट सॉर्गम, बाजरा, जौ जैसी कम पानी वाली फसलों पर भी शोध करें। दालों और तिलहन की खेती को प्रोत्साहित करें — इन्हें इथेनॉल के लिए न बदलें।
6 खाली ज़मीन पर वृक्षारोपण, फैक्ट्री नहीं
बंजर ज़मीन पर पेड़ लगाएं — यह जल, मिट्टी, जैव विविधता और कार्बन सीवेस्ट्रेशन सभी के लिए लाभदायक है। अगर फैक्ट्री लगानी ही है तो पहले पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) कराएं, ग्राम सभा की सहमति लें, और आग-रोधी उपाय सुनिश्चित करें।
7 इथेनॉल को एकमात्र समाधान न मानें
इथेनॉल एक उपकरण है, समाधान नहीं। विद्युतीय वाहन (EV), सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन — ये सभी भविष्य के ऊर्जा मिश्रण का हिस्सा हैं। इथेनॉल को एक "पुल" के रूप में देखें — जब तक EV पूरी तरह स्थापित नहीं हो जाते, तब तक इथेनॉल कुछ हद तक पेट्रोल की जगह ले सकता है — लेकिन सीमित और जिम्मेदार तरीके से।
अंतिम शब्द
इथेनॉल न तो जादू की गोली है जो सारी समस्याएं हल कर देगी, और न ही पूरी तरह बेकार है। यह एक उपकरण है — और किसी भी उपकरण की उपयोगिता उसे इस्तेमाल करने वाले की बुद्धिमत्ता पर निर्भर है। अगर हम जल-संकट के क्षेत्रों में भी इथेनॉल फैक्ट्री लगाएंगे, नदियों में ज़हर बहाएंगे, खाद्यान्न ईंधन में बदलेंगे, और खाली ज़मीन को बर्बाद करेंगे — तो इथेनॉल "ग्रीन फ्यूल" नहीं रहेगा, बल्कि एक और पर्यावरणीय आपदा बन जाएगा।
लेकिन अगर हम समझदारी से काम लें — जल-कुशल क्षेत्रों में ही प्लांट लगाएं, गन्ना-मोलास को प्राथमिकता दें, 2G तकनीक विकसित करें, ZLD सख्ती से लागू करें, भोजन सुरक्षा की दीवार बनाए रखें, और खाली ज़मीन पर वृक्षारोपण करें — तो इथेनॉल वास्तव में एक "सेतु" बन सकता है — जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ ऊर्जा की ओर जाने का एक सेतु।
विकास की दिशा तय करें — लेकिन विकास की कीमत पर्यावरण और गरीबों की ज़िंदगी नहीं होनी चाहिए।
यह लेख शोध आधारित जानकारी है। आंकड़े विभिन्न सरकारी रिपोर्टों, शैक्षणिक अध्ययनों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के आंकड़ों पर आधारित हैं।
स्रोत: CPCB, CGWB, NITI Aayog, Water Footprint Network, UNESCO-IHE, IOCL, FAO, USDA, EPA, IISc Bangalore
