Earth Core में क्या है?
पृथ्वी के गर्भ से लेकर उसके केंद्र तक — Inner Core, Outer Core, Mantle और Crust की संपूर्ण जानकारी। जानिए कैसे एक गलते हुए लोहे का गोला हमारी दुनिया को जीवित रखता है।
पृथ्वी के कोर का परिचय
जब आप अपने पैर जमीन पर रखते हैं, तो क्या कभी सोचा है कि आपके नीचे हजारों किलोमीटर गहराई में क्या है? पृथ्वी का कोर (Earth's Core) हमारे ग्रह का सबसे रहस्यमयी और शक्तिशाली हिस्सा है। यह वह स्थान है जहाँ तापमान सूर्य की सतह से भी अधिक है, दबाव इतना अधिक है कि ठोस लोहा भी पिघल जाता है, और जो ऊर्जा उत्पन्न होती है वह हमारे चुंबकीय क्षेत्र को जीवित रखती है।
पृथ्वी का कोर केवल एक गलता हुआ लोहे का द्रव्यमान नहीं है — यह हमारे ग्रह का धड़कता हुआ दिल है। बिना इसके, पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं होता। चुंबकीय क्षेत्र नहीं होता, वायुमंडल बह गया होता, और हम सूर्य की हानिकारक किरणों के सामने असहाय होते। यह कोर ही है जो पृथ्वी को मंगल ग्रह जैसा बंजर बनने से बचाता है।
इस विस्तृत लेख में हम पृथ्वी के कोर के बारे में सब कुछ जानेंगे — उसकी संरचना, तापमान, दबाव, रासायनिक संरचना, खोज का इतिहास, और नवीनतम वैज्ञानिक शोध। यह लेख Mahek Institute Rewa द्वारा प्रस्तुत है, जहाँ हम मानते हैं कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती।
पृथ्वी के कोर तक पहुँचने के लिए यदि हम एक सुरंग खोदें, तो यह दूरी लगभग 6,371 किलोमीटर होगी — यानी भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक की दूरी से भी कहीं अधिक! और अब तक मानव जाति ने सतह से केवल 12.2 किलोमीटर गहराई तक ही खोदा है।
पृथ्वी के कोर को समझना केवल वैज्ञानिक उत्सुकता नहीं है — यह हमारे अस्तित्व को समझने की कुंजी है। यह समझना कि कोर कैसे काम करता है, हमें भूकंपों की भविष्यवाणी, ज्वालामुखीय गतिविधि, और यहाँ तक कि जलवायु परिवर्तन को समझने में मदद करता है। आइए, इस अद्भुत यात्रा पर निकलें — सतह से लेकर पृथ्वी के सबसे गहरे बिंदु तक।
पृथ्वी की संरचना — चार परतें
पृथ्वी की संरचना को एक प्याज की तरह समझा जा सकता है — जिसमें एक के अंदर दूसरी परत है। पृथ्वी मुख्य रूप से चार परतों से बनी है: भूपर्पटी (Crust), मेंटल (Mantle), बाहरी कोर (Outer Core), और आंतरिक कोर (Inner Core)। प्रत्येक परत की अपनी विशेषताएँ हैं — अलग तापमान, अलग दबाव, अलग घनत्व, और अलग रासायनिक संरचना।
पृथ्वी की परतों का चित्रात्मक प्रतिनिधित्व (अनुपात में नहीं)
इन चारों परतों को दो तरीकों से वर्गीकृत किया जा सकता है। पहला — रासायनिक संरचना के आधार पर (Crust, Mantle, Core), और दूसरा — यांत्रिक गुणों के आधार पर (Lithosphere, Asthenosphere, Mesosphere, Outer Core, Inner Core)। रासायनिक वर्गीकरण अधिक प्रचलित है और इसी का उपयोग अधिकांश पाठ्यपुस्तकों में किया जाता है।
पृथ्वी की संरचना को समझने का सबसे कठिन हिस्सा यह है कि हम सीधे कोर तक नहीं पहुँच सकते। अब तक खोदी गई सबसे गहरी सुरंग — कोला सुपरडीप बोरहोल (Kola Superdeep Borehole) — मात्र 12.2 किलोमीटर गहरी है, जो पृथ्वी की त्रिज्या का लगभग 0.2% है। इसका मतलब है कि हमें कोर के बारे में जो भी जानकारी है, वह परोक्ष विधियों — मुख्य रूप से भूकंप तरंगों (Seismic Waves) के अध्ययन — से प्राप्त हुई है।
पृथ्वी की संरचना को समझने के लिए वैज्ञानिक भूकंपीय तरंगों (P-waves और S-waves) का उपयोग करते हैं। P-waves ठोस, तरल और गैस तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं, जबकि S-waves केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती हैं। S-waves का बाहरी कोर में न गुजरना यह सिद्ध करता है कि बाहरी कोर तरल है।
गहराई के अनुसार परतों का वितरण
पृथ्वी की परतें गहराई के साथ-साथ अपने गुणों में भी बदलती हैं। सतह पर ठोस चट्टानें हैं, मेंटल में अर्ध-ठोस मैग्मा है, बाहरी कोर में तरल धातु है, और आंतरिक कोर में अत्यधिक दबाव के कारण ठोस धातु है। यह बदलाव तापमान और दबाव दोनों पर निर्भर करता है। जैसे-जैसे हम गहराई में जाते हैं, तापमान और दबाव दोनों बढ़ते हैं, लेकिन उनका प्रभाव विपरीत होता है — तापमान वस्तु को पिघलाता है, जबकि दबाव उसे ठोस बनाता है। आंतरिक कोर में दबाव का प्रभाव तापमान से अधिक है, इसलिए वह ठोस रहता है।
भूपर्पटी (Crust) — पृथ्वी की सबसे बाहरी परत
भूपर्पटी या Crust पृथ्वी की सबसे बाहरी और सबसे पतली परत है। यह वह परत है जिसपर हम रहते हैं, खेती करते हैं, इमारतें बनाते हैं, और जिसे हम अपनी आँखों से देख सकते हैं। इसकी मोटाई महासागरों के नीचे लगभग 5-10 किलोमीटर और महाद्वीपों के नीचे 30-50 किलोमीटर है। यदि पृथ्वी को एक सेब मानें, तो भूपर्पटी सेब के छिलके जितनी पतली है।
महासागरीय बनाम महाद्वीपीय भूपर्पटी
भूपर्पटी दो प्रकार की होती है। महाद्वीपीय भूपर्पटी (Continental Crust) मुख्य रूप से ग्रेनाइट जैसी हल्की चट्टानों से बनी है, जिसमें सिलिकॉन, एल्युमीनियम, और पोटैशियम अधिक होता है। इसकी मोटाई 30-50 किमी है और इसका घनत्व लगभग 2.7 g/cm³ है। दूसरी ओर, महासागरीय भूपर्पटी (Oceanic Crust) मुख्य रूप से बेसाल्ट जैसी भारी चट्टानों से बनी है, जिसमें लोहा, मैग्नीशियम, और कैल्शियम अधिक होता है। इसकी मोटाई मात्र 5-10 किमी है और घनत्व लगभग 3.0 g/cm³ है।
| विशेषता | महाद्वीपीय Crust | महासागरीय Crust |
|---|---|---|
| मोटाई | 30-50 किमी | 5-10 किमी |
| घनत्व | 2.7 g/cm³ | 3.0 g/cm³ |
| मुख्य चट्टान | ग्रेनाइट | बेसाल्ट |
| आयु | 3.8 अरब वर्ष तक | 200 मिलियन वर्ष तक |
| प्रमुख तत्व | Si, Al, K | Fe, Mg, Ca |
भूपर्पटी प्लेट टेक्टोनिक्स के कारण निरंतर गति में रहती है। यह कई बड़ी और छोटी टेक्टोनिक प्लेटों में विभाजित है, जो अत्यंत धीमी गति (वर्ष में कुछ सेंटीमीटर) से चलती रहती हैं। इन प्लेटों के टकराने, अलग होने, या एक-दूसरे के नीचे जाने से भूकंप, ज्वालामुखी, और पर्वतों का निर्माण होता है। हिमालय पर्वत भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराने से बना है, और यह प्रक्रिया आज भी जारी है — हिमालय हर साल लगभग 5 मिमी ऊँचा हो रहा है।
भूपर्पटी का अध्ययन भूविज्ञान (Geology) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। चट्टानों के अध्ययन से हमें पृथ्वी के इतिहास, जीवाश्मों, और प्राकृतिक संसाधनों जैसे कोयला, पेट्रोलियम, और खनिजों के बारे में जानकारी मिलती है। Mahek Institute Rewa में हम छात्रों को इन मूलभूत अवधारणाओं को गहराई से समझने का अवसर प्रदान करते हैं।
मेंटल (Mantle) — पृथ्वी की सबसे मोटी परत
मेंटल (Mantle) पृथ्वी की सबसे मोटी परत है, जो भूपर्पटी के नीचे से बाहरी कोर तक फैली है। इसकी मोटाई लगभग 2,900 किलोमीटर है और यह पृथ्वी के कुल आयतन का लगभग 84% और कुल द्रव्यमान का लगभग 67% भाग बनाती है। मेंटल मुख्य रूप से सिलिकेट खनिजों (silicate minerals) से बना है, जिनमें लोहा और मैग्नीशियम प्रमुख हैं।
मेंटल की उप-परतें
मेंटल को तीन मुख्य उप-परतों में बाँटा जाता है:
1. ऊपरी मेंटल (Upper Mantle) — 35 से 670 किमी
ऊपरी मेंटल भूपर्पटी के ठीक नीचे स्थित है। इसका ऊपरी भाग ठोस और भंगुर है, जिसे भूपर्पटी के साथ मिलाकर लिथोस्फियर (Lithosphere) कहा जाता है। इसके नीचे का भाग एस्थेनोस्फियर (Asthenosphere) कहलाता है, जो अर्ध-ठोस या प्लास्टिक अवस्था में है। एस्थेनोस्फियर ही वह परत है जिसपर टेक्टोनिक प्लेटें तैरती हैं। इसका तापमान 1,000°C से 1,500°C के बीच है।
2. संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone) — 410 से 660 किमी
यह ऊपरी और निचली मेंटल के बीच का क्षेत्र है। यहाँ खनिजों की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव होता है — ओलिवीन खनिज वैड्सलेइट और फिर रिंगवुडाइट में बदलता है। इस क्षेत्र में पानी भी मौजूद हो सकता है — रिंगवुडाइट खनिज के अध्ययन से पता चला है कि संक्रमण क्षेत्र में विशाल मात्रा में जल संग्रहित हो सकता है, जो पृथ्वी की सतह पर मौजूद सभी समुद्रों के जल से कई गुना अधिक हो सकता है।
2014 में एक अध्ययन में ब्राजील में मिले एक रिंगवुडाइट खनिज से पता चला कि मेंटल के संक्रमण क्षेत्र में लगभग 1.4% जल है। इसका अर्थ है कि मेंटल में इतना पानी हो सकता है जो सतह के सभी महासागरों के पानी से तीन गुना अधिक हो!
3. निचली मेंटल (Lower Mantle) — 660 से 2,900 किमी
निचली मेंटल सबसे गहरी और सबसे गर्म उप-परत है। यहाँ दबाव इतना अधिक है कि खनिजों की संरचना बदल जाती है — ब्रिजमेनाइट (पहले सिलिकेट पेरोव्स्काइट कहलाता था) यहाँ का सबसे प्रचुर खनिज है। इसका तापमान 1,900°C से 3,700°C के बीच है। निचली मेंटल में संवहन धाराएँ (Convection Currents) चलती हैं, जो ऊपरी मेंटल और भूपर्पटी की टेक्टोनिक गतियों को प्रेरित करती हैं।
मेंटल में संवहन धाराएँ (Convection Currents) पृथ्वी की भूवैज्ञानिक गतिविधियों का मुख्य संचालक हैं। गर्म पदार्थ ऊपर उठता है, ठंडा होकर घना हो जाता है, और फिर नीचे डूबता है — यह चक्रीय गति टेक्टोनिक प्लेटों को धकेलती है, जिससे महाद्वीपों का विस्थापन, ज्वालामुखी विस्फोट, और भूकंप होते हैं। यह प्रक्रिया लाखों वर्षों से चल रही है और पृथ्वी की सतह को निरंतर रूप से बदल रही है।
बाहरी कोर (Outer Core) — तरल धातु का समुद्र
बाहरी कोर (Outer Core) पृथ्वी की एकमात्र पूर्ण रूप से तरल परत है। यह लगभग 2,900 किलोमीटर की गहराई से शुरू होकर 5,150 किलोमीटर की गहराई तक फैला है, यानी इसकी मोटाई लगभग 2,250 किलोमीटर है। यह मुख्य रूप से तरल लोहा (Liquid Iron) और निकल (Nickel) से बना है, जिसमें लगभग 10% हल्के तत्व जैसे सल्फर, ऑक्सीजन, सिलिकॉन, हाइड्रोजन और कार्बन भी शामिल हैं।
बाहरी कोर का तापमान 4,400°C से 5,000°C के बीच है और दबाव 135 से 330 GPa (गीगापास्कल) के बीच है। इतने उच्च तापमान पर भी, बाहरी कोर तरल अवस्था में है क्योंकि यहाँ का दबाव आंतरिक कोर की तुलना में कम है। आंतरिक कोर में दबाव इतना अधिक है कि लोहा ठोस रहता है, भले ही तापमान और भी अधिक हो।
बाहरी कोर का महत्व — चुंबकीय क्षेत्र का जनक
बाहरी कोर की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) को उत्पन्न करना है। यह प्रक्रिया जिओडायनामो (Geodynamo) कहलाती है। बाहरी कोर में तरल लोहे की संवहन धाराएँ चलती हैं — गर्म तरल लोहा ऊपर उठता है और ठंडा होकर नीचे डूबता है। पृथ्वी के घूर्णन के कारण इन धाराओं में कोरियोलिस प्रभाव (Coriolis Effect) लगता है, जो उन्हें सर्पिल आकार देता है। चलती हुई विद्युत चालक धातु विद्युत धारा उत्पन्न करती है, और यह विद्युत धारा चुंबकीय क्षेत्र बनाती है।
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र सूर्य से आने वाली हानिकारक सौर विकिरणों (Solar Wind) और कॉस्मिक किरणों से हमारी रक्षा करता है। बिना इसके, सौर हवा वायुमंडल को उड़ा ले जाती — ठीक वैसे ही जैसे मंगल ग्रह ने अपना वायुमंडल खो दिया। मंगल ग्रह का कोर ठंडा हो गया, उसका चुंबकीय क्षेत्र समाप्त हो गया, और सौर हवा ने उसका वायुमंडल छीन लिया।
बाहरी कोर में हल्के तत्वों की उपस्थिति
शुद्ध लोहे का घनत्व बाहरी कोर में मापे गए घनत्व से अधिक है, जिससे वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि बाहरी कोर में लगभग 10% हल्के तत्व मौजूद हैं। ये हल्के तत्व कौन से हैं — यह अभी भी वैज्ञानिक बहस का विषय है। सबसे अधिक संभावना सल्फर, ऑक्सीजन, सिलिकॉन, कार्बन और हाइड्रोजन की है। इन तत्वों की पहचान महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि पृथ्वी का निर्माण कैसे हुआ और उसकी शुरुआती स्थितियाँ कैसी थीं।
बाहरी कोर में तरल लोहे का प्रवाह अत्यंत गतिशील है। यह प्रवाह समय के साथ बदलता रहता है, जिसके कारण पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र भी बदलता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि पृथ्वी का चुंबकीय उत्तरी ध्रुव तेजी से साइबेरिया की ओर खिसक रहा है — प्रति वर्ष लगभग 50-60 किलोमीटर। इसके अलावा, पिछले दो शताब्दियों में चुंबकीय क्षेत्र की ताकत लगभग 9% कम हुई है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह चुंबकीय ध्रुव विपर्यय (Magnetic Pole Reversal) का संकेत हो सकता है।
आंतरिक कोर (Inner Core) — पृथ्वी का सबसे गहरा रहस्य
आंतरिक कोर (Inner Core) पृथ्वी का सबसे गहरा, सबसे गर्म, और सबसे दबावयुक्त हिस्सा है। यह लगभग 5,150 किलोमीटर की गहराई से पृथ्वी के केंद्र (6,371 किमी) तक फैला है, यानी इसकी त्रिज्या लगभग 1,221 किलोमीटर है — यह चंद्रमा की त्रिज्या (1,737 किमी) के लगभग 70% है। इसका तापमान लगभग 5,400°C (9,800°F) है, जो सूर्य की सतह के तापमान (5,500°C) के बहुत करीब है।
आंतरिक कोर मुख्य रूप से ठोस लोहा (Solid Iron) और निकल का बना है, जो Hexagonal Close-Packed (HCP) क्रिस्टल संरचना में है। यहाँ दबाव अविश्वसनीय रूप से अधिक है — लगभग 330 से 360 GPa, जो वायुमंडलीय दबाव से लगभग 3.6 मिलियन गुना अधिक है। इतने अधिक दबाव के कारण, भले ही तापमान सूर्य की सतह के बराबर हो, लोहा ठोस अवस्था में रहता है। यह दबाव और तापमान के बीच एक अद्भुत संतुलन का परिणाम है।
आंतरिक कोर की खोज — इंगे लेहमैन की कहानी
आंतरिक कोर की खोज 1936 में डेनिश भूभौतिक वैज्ञानिक इंगे लेहमैन (Inge Lehmann) ने की थी। उन्होंने भूकंप के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए पाया कि कुछ P-waves ऐसे परावर्तित हो रही थीं जो तब संभव हो सकता था यदि कोर के भीतर एक और ठोस परत हो। उनके शोध पत्र का शीर्षक था "P'" — एक सरल अक्षर जिसने पृथ्वी विज्ञान की दिशा बदल दी।
इंगे लेहमैन ने एक ऐसे युग में यह खोज की जब महिलाओं को विज्ञान में गंभीरता से नहीं लिया जाता था। उन्होंने अपना अधिकांश काम अकेले किया और डेटा का सूक्ष्म विश्लेषण करके वह खोज की जो उस समय के प्रमुख वैज्ञानिक भी नहीं कर पाए थे। Mahek Institute Rewa ऐसी ही प्रेरणादायक महिलाओं की कहानियों को अपने छात्रों तक पहुँचाता है।
आंतरिक कोर का घूर्णन — क्या यह स्वतंत्र रूप से घूमता है?
2005 में वैज्ञानिकों ने एक आश्चर्यजनक खोज की — आंतरिक कोर पृथ्वी की सतह से थोड़ा अलग गति से घूमता है। शुरू में माना गया कि यह सतह से लगभग 0.3° से 0.5° प्रति वर्ष तेजी से घूमता है (सुपर-रोटेशन)। हालांकि, 2023 के एक अध्ययन में पeking विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने दावा किया कि आंतरिक कोर का घूर्णन 2009 के आसपास धीमा हो गया और संभवतः उल्टी दिशा में घूमने लगा है। यह खोज अभी भी बहस के दायरे में है।
आंतरिक कोर की आयु
आंतरिक कोर की आयु पर भी वैज्ञानिकों में मतभेद है। कुछ अनुमानों के अनुसार यह लगभग 1 अरब वर्ष पुराना है, जबकि अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि यह 500 मिलियन वर्ष से भी कम पुराना हो सकता है। आंतरिक कोर का निर्माण तब हुआ जब पृथ्वी का तापमान इतना कम हो गया कि तरल लोहे का केंद्रीकरण शुरू हुआ। यह प्रक्रिया आज भी जारी है — आंतरिक कोर प्रति वर्ष लगभग 1 मिलीमीटर की दर से बढ़ रहा है।
आंतरिक कोर की आंतरिक संरचना — सबसे भीतर का रहस्य
2021 और 2023 के शोधों से पता चला है कि आंतरिक कोर के भीतर एक और परत हो सकती है, जिसे आंतरतम कोर (Innermost Inner Core) कहा जा रहा है। इसकी त्रिज्या लगभग 650 किलोमीटर हो सकती है। इसकी क्रिस्टल संरचना बाहरी आंतरिक कोर से भिन्न प्रतीत होती है — जबकि बाहरी भाग की क्रिस्टल संरचना उत्तर-दक्षिण दिशा में अनुकूलित है, आंतरतम कोर की संरचना पूर्व-पश्चिम दिशा में अनुकूलित लगती है। यह खोज अभी प्रारंभिक है और अधिक शोध की आवश्यकता है।
कोर का तापमान — सूर्य की सतह से भी अधिक गर्म
पृथ्वी के कोर का तापमान वैज्ञानिकों के लिए एक लंबे समय से रहस्य रहा है। चूँकि हम सीधे कोर तक नहीं पहुँच सकते, इसलिए तापमान का अनुमान परोक्ष विधियों से लगाया जाता है। वर्तमान अनुमानों के अनुसार, आंतरिक कोर का तापमान लगभग 5,400°C (9,800°F) है, जो सूर्य की सतह के तापमान (5,500°C) के अत्यंत निकट है।
तापमान कैसे मापा जाता है?
कोर का तापमान सीधे नहीं मापा जा सकता, इसलिए वैज्ञानिक लेबोरेटरी में उच्च दबाव और उच्च तापमान की स्थितियाँ बनाकर लोहे के गलनांक (Melting Point) को निर्धारित करते हैं। चूँकि आंतरिक कोर ठोस है और बाहरी कोर तरल है, आंतरिक कोर का तापमान उस बिंदु पर लोहे के गलनांक के बराबर या उससे थोड़ा कम होना चाहिए। इसे निर्धारित करने के लिए दो मुख्य तकनीकों का उपयोग होता है:
1. डायमंड एनविल सेल (Diamond Anvil Cell): इस तकनीक में दो हीरों के बीच लोहे के नमूने को रखकर अत्यधिक दबाव (लाखों वायुमंडल) लगाया जाता है और लेजर से गर्म किया जाता है। फिर X-रे विवर्तन (X-ray Diffraction) से यह पता लगाया जाता है कि किस तापमान पर लोहा पिघलता है।
2. शॉक कंप्रेशन (Shock Compression): इसमें गैस बंदूक या लेजर पल्स का उपयोग करके लोहे के नमूने पर तीव्र दबाव लगाया जाता है। यह तकनीक अत्यंत उच्च दबाव और तापमान उत्पन्न कर सकती है, लेकिन समय बहुत कम (नैनोसेकंड) होता है।
पृथ्वी के कोर का तापमान तीन मुख्य स्रोतों से आता है: (1) पृथ्वी के निर्माण के समय का अवशिष्ट ऊष्मा (Primordial Heat) — जब पृथ्वी बनी थी तो गुरुत्वाकर्षण के कारण पदार्थों के एकत्रित होने से अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न हुई थी; (2) रेडियोधर्मी क्षय (Radioactive Decay) — यूरेनियम-238, थोरियम-232, और पोटैशियम-40 जैसे रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय से ऊष्मा निकलती है; (3) आंतरिक कोर का क्रिस्टलीकरण — जब तरल लोहा ठोस आंतरिक कोर बनाता है, तो गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) निकलती है।
भूतापीय ढाल (Geothermal Gradient)
पृथ्वी की सतह से नीचे जाने पर तापमान में जो वृद्धि होती है, उसे भूतापीय ढाल कहते हैं। भूपर्पटी के ऊपरी भाग में यह लगभग 25-30°C प्रति किलोमीटर है — यानी हर 1 किमी नीचे जाने पर तापमान 25-30°C बढ़ता है। हालांकि, यह दर गहराई के साथ कम होती जाती है। मेंटल में यह दर लगभग 0.5°C प्रति किमी है, और कोर में और भी कम। इसका कारण है कि गहराई में ऊष्मा का परिवहन संवहन (Convection) द्वारा अधिक प्रभावी होता है, जो चालन (Conduction) से अधिक कुशल है।
कोर की संरचना — क्या तत्व पाए जाते हैं?
पृथ्वी के कोर की रासायनिक संरचना को समझना भूरसायन (Geochemistry) का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। चूँकि हम सीधे कोर से नमूने नहीं ले सकते, वैज्ञानिकों ने कई परोक्ष साक्ष्यों का उपयोग किया है — उल्कापिंडों (Meteorites) का अध्ययन, भूकंपीय तरंगों की गति, पृथ्वी के घनत्व और जड़त्व आघूर्ण (Moment of Inertia) की गणना, और उच्च दबाव प्रयोगों के परिणाम।
| तत्व | बाहरी कोर (अनुमानित %) | आंतरिक कोर (अनुमानित %) |
|---|---|---|
| लोहा (Iron - Fe) | ~85% | ~85% |
| निकल (Nickel - Ni) | ~5% | ~5-10% |
| सल्फर (Sulfur - S) | ~1-3% | — |
| ऑक्सीजन (Oxygen - O) | ~0-5% | — |
| सिलिकॉन (Silicon - Si) | ~0-6% | — |
| कार्बन (Carbon - C) | ~0-2% | ~0-0.5% |
| हाइड्रोजन (Hydrogen - H) | ~0-0.5% | — |
उल्कापिंडों से मिली जानकारी
पृथ्वी और सौर मंडल के अन्य ग्रह एक ही गैस और धूल के बादल (Solar Nebula) से बने हैं। इसलिए, कोंड्राइटिक उल्कापिंडों (Chondritic Meteorites) का अध्ययन पृथ्वी की संरचना को समझने का एक महत्वपूर्ण साधन है। ये उल्कापिंड पृथ्वी के निर्माण के समय की सामग्री के समान हैं। आयरन मीटियोराइट्स (लौह उल्कापिंड) लगभग 90% लोहा और 10% निकल से बने होते हैं, जो पृथ्वी के कोर की संरचना के बहुत करीब है।
कोर में लोहा क्यों है?
पृथ्वी के निर्माण के शुरुआती चरण में, जब पृथ्वी एक गलता हुआ पिंड थी, भारी तत्व (मुख्य रूप से लोहा और निकल) गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी के केंद्र की ओर डूब गए। इस प्रक्रिया को विभेदीकरण (Differentiation) कहते हैं। हल्के तत्व (सिलिकॉन, एल्युमीनियम, ऑक्सीजन) सतह की ओर आ गए और भूपर्पटी बनाई। यह प्रक्रिया लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले हुई और इसने पृथ्वी की वर्तमान संरचना को आकार दिया।
लोहा पृथ्वी के कोर में इसलिए है क्योंकि यह सौर मंडल में सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला भारी तत्व है। हाइड्रोजन और हीलियम सबसे प्रचुर हैं लेकिन वे हल्के हैं। लोहा की प्रचुरता नाभिकीय संश्लेषण (Nucleosynthesis) का परिणाम है — तारों के अंदर नाभिकीय संलयन की अंतिम अवस्था में लोहे का निर्माण होता है, और सुपरनोवा विस्फोटों से यह अंतरिक्ष में फैल जाता है।
कुछ अनुमानों के अनुसार, पृथ्वी के कोर में इतना सोना (Gold) है जो पृथ्वी की सतह को 1.5 फीट मोटी परत से ढक सकता है! लोहे के साथ सोना भी भारी तत्व है और विभेदीकरण के दौरान कोर में चला गया। यही कारण है कि सतह पर सोना इतना दुर्लभ है — अधिकांश सोना हमसे हजारों किलोमीटर नीचे है।
भूकंप तरंगें — कोर की खोज कैसे हुई?
भूकंप तरंगें (Seismic Waves) पृथ्वी के आंतरिक भागों को समझने का सबसे शक्तिशाली साधन हैं। जब भूकंप होता है, तो ऊर्जा तरंगों के रूप में पृथ्वी के भीतर से गुजरती है। इन तरंगों की गति, दिशा, और व्यवहार से वैज्ञानिक पृथ्वी के भीतर की संरचना का नक्शा बनाते हैं — ठीक वैसे ही जैसे X-रे से शरीर की आंतरिक संरचना दिखती है।
भूकंप तरंगों के प्रकार
भूकंप तरंगें मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं:
1. P-तरंगें (Primary Waves / Pressure Waves): ये सबसे तेज तरंगें हैं (6-14 किमी/सेकंड) और भूकंपमापी द्वारा सबसे पहले दर्ज की जाती हैं। ये अनुदैर्ध्य तरंगें (Longitudinal Waves) हैं — इनमें कण तरंग की दिशा में आगे-पीछे कंपन करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात — P-तरंगें ठोस, तरल और गैस तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं।
2. S-तरंगें (Secondary Waves / Shear Waves): ये P-तरंगों से धीमी हैं (3-7 किमी/सेकंड) और दूसरी दर्ज की जाती हैं। ये अनुप्रस्थ तरंगें (Transverse Waves) हैं — इनमें कण तरंग की दिशा के लंबवत कंपन करते हैं। S-तरंगें केवल ठोस माध्यम से गुजर सकती हैं — तरल और गैस से नहीं। यही गुण बाहरी कोर की तरल प्रकृति का प्रमाण देता है।
P-wave (लाल) और S-wave (नीली) का एनिमेटेड प्रदर्शन
Shadow Zone — छाया क्षेत्र
जब P-तरंगें बाहरी कोर से गुजरती हैं, तो उनकी दिशा तेजी से बदलती है (अपवर्तन) क्योंकि बाहरी कोर का घनत्व मेंटल से भिन्न है। इसके परिणामस्वरूप, 104° से 140° के बीच के क्षेत्र में P-तरंगें नहीं पहुँचतीं — इसे P-wave Shadow Zone कहते हैं। इसी तरह, S-तरंगें बाहरी कोर से बिल्कुल नहीं गुजरतीं, इसलिए 104° से अधिक कोण पर S-wave Shadow Zone बनता है। इन Shadow Zones की खोज ने पहली बार सिद्ध किया कि पृथ्वी के केंद्र में एक तरल परत है।
भूकंप तरंगों के अध्ययन से हमें यह जानकारी मिलती है: (1) पृथ्वी की परतों की गहराई, (2) प्रत्येक परत की अवस्था (ठोस/तरल), (3) परतों का घनत्व और संरचना, (4) कोर के भीतर असंगतताएँ (जैसे Innermost Inner Core), (5) मेंटल में संवहन पैटर्न। प्रत्येक भूकंप एक प्राकृतिक प्रयोग है जो हमें पृथ्वी के भीतर झाँकने का मौका देता है।
चुंबकीय क्षेत्र और कोर — पृथ्वी की रक्षा कवच
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र (Earth's Magnetic Field) हमारे ग्रह के सबसे महत्वपूर्ण गुणों में से एक है। यह एक अदृश्य ढाल है जो हमें सूर्य की हानिकारक किरणों और कॉस्मिक विकिरणों से बचाता है। और यह ढाल पृथ्वी के बाहरी कोर में उत्पन्न होती है। बिना चुंबकीय क्षेत्र के, पृथ्वी पर जीवन जैसा हम जानते हैं, संभव नहीं होता।
जिओडायनामो (Geodynamo) — चुंबकीय क्षेत्र कैसे बनता है?
पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का सिद्धांत जिओडायनामो सिद्धांत (Geodynamo Theory) द्वारा समझाया जाता है। इसके अनुसार:
बाहरी कोर में तरल लोहा और निकल विद्युत चालक हैं। पृथ्वी के आंतरिक ऊष्मा और संवहन के कारण यह तरल धातु चलती रहती है — गर्म तरल ऊपर उठता है और ठंडा तरल नीचे डूबता है। पृथ्वी के घूर्णन के कारण कोरियोलिस प्रभाव लगता है, जो इन संवहन धाराओं को सर्पिल आकार देता है। चलती हुई विद्युत चालक धातु विद्युत धारा उत्पन्न करती है (विद्युत चुंबकीय प्रेरण का नियम)। यह विद्युत धारा एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। यह चुंबकीय क्षेत्र पुनः विद्युत धारा को प्रभावित करता है, जिससे चुंबकीय क्षेत्र स्वयं बना रहता है — यह एक स्व-स्थायी प्रक्रिया (Self-sustaining process) है।
चुंबकीय ध्रुव विपर्यय (Magnetic Reversal)
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र स्थिर नहीं है — यह समय के साथ बदलता रहता है। सबसे नाटकीय बदलाव चुंबकीय ध्रुव विपर्यय है — जब उत्तरी और दक्षिणी चुंबकीय ध्रुव अपनी जगहें बदल लेते हैं। पिछले 5 मिलियन वर्षों में लगभग 20 बार ऐसा हुआ है। पिछली बार यह लगभग 7,80,000 वर्ष पहले हुआ था (Brunhes-Matuyama Reversal)।
चुंबकीय ध्रुव विपर्यय के संकेतों में शामिल हैं: चुंबकीय क्षेत्र की ताकत में कमी (पिछले 200 वर्षों में लगभग 9% कमी), चुंबकीय ध्रुवों का तेजी से खिसकना, और दक्षिण अटलांटिक एनोमली (South Atlantic Anomaly) — एक क्षेत्र जहाँ चुंबकीय क्षेत्र असामान्य रूप से कमजोर है। हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि निकट भविष्य में ध्रुव विपर्यय की संभावना नहीं है — यह प्रक्रिया हजारों वर्ष लेती है।
पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र द्वारा फँसाए गए उच्च ऊर्जा वाले आवेशित कणों के दो विशाल टोरस-आकार के क्षेत्र वैन एलेन विकिरण पट्टी (Van Allen Radiation Belts) कहलाते हैं। इनकी खोज 1958 में जेम्स वैन एलेन ने एक्सप्लोरर 1 उपग्रह द्वारा की थी। ये पट्टियाँ पृथ्वी को कॉस्मिक किरणों और सौर विकिरणों से अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करती हैं।
खोज का इतिहास — कोर तक की यात्रा
पृथ्वी के कोर की खोज एक रोमांचक वैज्ञानिक कहानी है जो दो शताब्दियों से अधिक समय तक फैली है। यह खोज एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि कई वैज्ञानिकों की अथक प्रयासों का परिणाम है। Mahek Institute Rewa इस इतिहास को अपने छात्रों तक पहुँचाता है ताकि वे विज्ञान की यात्रा से प्रेरित हो सकें।
नवीनतम शोध और खोजें
पृथ्वी के कोर पर शोध निरंतर जारी है और हर साल नई खोजें हमारी समझ को गहरा रही हैं। आइए कुछ प्रमुख नवीनतम शोधों पर नज़र डालें:
1. आंतरिक कोर का घूर्णन बदल गया (2023)
पeking विश्वविद्यालय के यांग सोंग और उनकी टीम ने 2023 में प्रकाशित शोध में दावा किया कि आंतरिक कोर का घूर्णन लगभग 2009 में धीमा हो गया और संभवतः पृथ्वी की सतह के सापेक्ष उल्टी दिशा में घूमने लगा। यह बदलाव लगभग 70 वर्षों के चक्र का हिस्सा हो सकता है। इसका कारण बाहरी कोर में होने वाले चुंबकीय टोक़ (Magnetic Torque) और मेंटल का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव हो सकता है।
2. आंतरतम कोर की खोज (2023)
एनेस्टेसिया ब्रोज़िन्स्का और उनकी टीम ने 2023 में प्रकाशित अध्ययन में आंतरिक कोर के भीतर एक और परत —आंतरतम कोर (Innermost Inner Core) — की पुष्टि की। उन्होंने पृथ्वी के विपरीत पक्षों से गुजरने वाली भूकंप तरंगों का विश्लेषण किया और पाया कि आंतरिक कोर के सबसे भीतरी भाग (त्रिज्या ~650 किमी) में क्रिस्टल संरचना बाहरी भाग से भिन्न है। बाहरी आंतरिक कोर की क्रिस्टल संरचना उत्तर-दक्षिण दिशा में अनुकूलित है, जबकि आंतरतम कोर की संरचना लगभग 45° कोण पर अनुकूलित प्रतीत होती है। यह खोज बताती है कि पृथ्वी के कोर का विकास एकल चरण में नहीं, बल्कि कई चरणों में हुआ होगा।
3. बाहरी कोर में हल्के तत्वों की पहचान (2022-2024)
हाई-प्रेशर लेबोरेटरी प्रयोगों और प्रथम-सिद्धांत (First-principles) गणनाओं से वैज्ञानिकों ने बाहरी कोर में हल्के तत्वों की पहचान करने में प्रगति की है। वर्तमान सर्वाधिक स्वीकृत मॉडल के अनुसार, बाहरी कोर में लगभग 85% लोहा, 5% निकल, और शेष 10% में सल्फर, ऑक्सीजन, सिलिकॉन, कार्बन और हाइड्रोजन शामिल हैं। 2024 के एक अध्ययन में पाया गया कि हाइड्रोजन की उपस्थिति पहले सोचे से कहीं अधिक हो सकती है — यह बाहरी कोर के हल्के तत्वों का एक प्रमुख घटक हो सकता है।
4. कोर की ऊष्मा प्रवाह दर में असमानता (2021)
भूकंपीय टोमोग्राफी (Seismic Tomography) के अध्ययन से पता चला है कि कोर-मेंटल सीमा (Core-Mantle Boundary) पर ऊष्मा प्रवाह असमान है — कुछ क्षेत्रों में अधिक और कुछ में कम। इस असमानता का बाहरी कोर में संवहन पैटर्न और चुंबकीय क्षेत्र की संरचना पर गहरा प्रभाव पड़ता है। विशेष रूप से, प्रशांत महासागर के नीचे के क्षेत्र में असामान्य रूप से कम भूकंपीय गति (ULVZ — Ultra-Low Velocity Zones) पाई गई है, जो संभवतः कोर-मेंटल सीमा पर आंशिक रूप से पिघली हुई चट्टानों का संकेत देती है।
आधुनिक डायमंड एनविल सेल (DAC) तकनीक लेबोरेटरी में कोर के समान दबाव (350+ GPa) और तापमान (5000+°C) उत्पन्न कर सकती है। लेजर हीटिंग DAC के साथ सिंक्रोट्रॉन X-रे विवर्तन का उपयोग करके वैज्ञानिक लोहे के मिश्रधातुओं के गलनांक, क्रिस्टल संरचना, और विद्युत प्रवाहकता को सीधे माप सकते हैं। ये प्रयोग कोर की संरचना और व्यवहार को समझने का सबसे प्रत्यक्ष साधन हैं।
5. कोर-मेंटल सीमा पर पानी की उपस्थिति (2024)
2024 के एक अभूतपूर्व शोध में, वैज्ञानिकों ने पाया कि कोर-मेंटल सीमा पर पानी और लोहे की अभिक्रिया से एक नया चरण — FeOOHx (लौह ऑक्सी-हाइड्रॉक्साइड) — बन सकता है। इससे पता चलता है कि पानी पृथ्वी की सतह से सबडक्शन (Subduction) के माध्यम से कोर-मेंटल सीमा तक पहुँच सकता है। यह खोज पृथ्वी के जल चक्र की समझ को पूरी तरह बदल सकती है — पानी केवल सतह तक सीमित नहीं है, बल्कि पृथ्वी के सबसे गहरे भागों तक भी पहुँच सकता है।
6. चुंबकीय क्षेत्र का कमजोर होना
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के Swarm मिशन के आंकड़ों से पता चला है कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र पिछले 200 वर्षों में लगभग 9% कमजोर हुआ है। दक्षिण अटलांटिक एनोमली (South Atlantic Anomaly) — दक्षिण अमेरिका और दक्षिणी अफ्रीका के बीच का क्षेत्र — में चुंबकीय क्षेत्र विशेष रूप से कमजोर है। यह कमजोरी बाहरी कोर में लोहे के प्रवाह में बदलाव के कारण हो सकती है। हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तुरंत कोई खतरा नहीं है — चुंबकीय ध्रुव विपर्यय हजारों वर्षों में होता है और इसके दौरान चुंबकीय क्षेत्र पूरी तरह समाप्त नहीं होता।
रोचक तथ्य — पृथ्वी के कोर के बारे में आश्चर्यजनक जानकारी
पृथ्वी के कोर से जुड़े कई ऐसे तथ्य हैं जो आपको आश्चर्यचकित कर देंगे। Mahek Institute Rewa आपके लिए इन रोचक तथ्यों का संकलन करता है:
तुलना — पृथ्वी और अन्य ग्रहों के कोर
पृथ्वी का कोर अद्वितीय नहीं है — सौर मंडल के अन्य पथग्रहों (Terrestrial Planets) में भी लौह कोर हैं। लेकिन पृथ्वी का कोर विशेष है क्योंकि यह अभी भी सक्रिय रूप से एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है। आइए तुलना करें:
| विशेषता | पृथ्वी | मंगल | बुध | शुक्र |
|---|---|---|---|---|
| कोर की स्थिति | आंशिक रूप से तरल | पूर्ण ठोस (अनुमानित) | पूर्ण ठोस | अनिश्चित |
| चुंबकीय क्षेत्र | मजबूत ✅ | बहुत कमजोर ❌ | बहुत कमजोर ❌ | नहीं के बराबर ❌ |
| कोर का आकार (त्रिज्या) | ~3,480 किमी | ~1,700 किमी | ~2,020 किमी | ~3,000 किमी (अनुमानित) |
| कोर त्रिज्या/ग्रह त्रिज्या | ~55% | ~50% | ~82% | ~50% |
| टेक्टोनिक प्लेटें | सक्रिय ✅ | निष्क्रिय ❌ | निष्क्रिय ❌ | संभवतः सक्रिय |
| ज्वालामुखी | सक्रिय ✅ | प्राचीन (अनियमित) | अत्यंत प्राचीन | संभवतः सक्रिय |
मंगल ग्रह — एक चेतावनी
मंगल ग्रह पृथ्वी के आकार का लगभग आधा है, लेकिन इसका कोर बहुत पहले ठंडा हो गया। इसका मतलब है कि बाहरी कोर में तरल लोहे का प्रवाह बंद हो गया, जिससे चुंबकीय क्षेत्र समाप्त हो गया। बिना चुंबकीय क्षेत्र के, सौर हवा ने मंगल के वायुमंडल को धीरे-धीरे उड़ा दिया। लगभग 4 अरब वर्ष पहले, मंगल पर जल और संभवतः जीवन था — लेकिन बिना चुंबकीय क्षेत्र के, यह सब खत्म हो गया। Mahek Institute Rewa के छात्रों को यह सबसे महत्वपूर्ण सबक सिखाया जाता है — कोर हमारी रक्षा करता है।
बुध ग्रह — सबसे बड़ा कोर अनुपात
बुध ग्रह का कोर ग्रह की कुल त्रिज्या का लगभग 82% है — यह सौर मंडल के पथग्रहों में सबसे बड़ा कोर अनुपात है। इसका कारण संभवतः यह है कि बुध के निर्माण के बाद एक विशाल टक्कर ने उसकी बाहरी परतें उड़ा दीं, जिससे केवल कोर और एक पतली मेंटल बची। बुध का कोर अब पूरी तरह ठोस है और उसका चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी का लगभग 1% है।
शुक्र ग्रह — एक पहेली
शुक्र पृथ्वी के आकार का लगभग जुड़वां है, फिर भी इसका चुंबकीय क्षेत्र लगभग शून्य है। यह आश्चर्यजनक है क्योंकि इसके आकार के आधार पर इसका कोर अभी भी आंशिक रूप से तरल होना चाहिए। एक संभावित कारण यह है कि शुक्र बहुत धीमी गति से घूमता है (एक घूर्णन में 243 पृथ्वी दिन) — इसलिए कोरियोलिस प्रभाव लगभग नहीं के बराबर है, और जिओडायनामो प्रभावी नहीं हो पाता। दूसरा संभावित कारण यह है कि शुक्र के कोर की संरचना पृथ्वी से भिन्न हो सकती है।
पृथ्वी सौर मंडल का एकमात्र पथग्रह है जिसमें एक सक्रिय जिओडायनामो, सक्रिय टेक्टोनिक प्लेटें, और सतह पर तरल पानी — तीनों एक साथ मौजूद हैं। ये तीनों गुण आपस में जुड़े हुए हैं: कोर से चुंबकीय क्षेत्र बनता है जो वायुमंडल को बचाता है, मेंटल से संवहन धाराएँ टेक्टोनिक प्लेटों को चलाती हैं, और टेक्टोनिक गतियाँ ज्वालामुखी और पर्वत बनाती हैं जो जलवायु को नियंत्रित करती हैं। यह सब कोर से शुरू होता है।
गहराई का मानचित्र — सतह से कोर तक
नीचे दिया गया चित्र पृथ्वी की सतह से कोर तक की गहराई और प्रत्येक परत की मोटाई को दर्शाता है:
0 - 35/70 किमी | ठोस | तापमान: ~20-600°C
35 - 670 किमी | अर्ध-ठोस | तापमान: ~500-1,900°C
670 - 2,900 किमी | ठोस (प्लास्टिक) | तापमान: ~1,900-3,700°C
2,900 - 5,150 किमी | तरल | तापमान: ~4,000-5,000°C
5,150 - 6,371 किमी | ठोस | तापमान: ~5,000-5,400°C
महत्वपूर्ण सीमाएँ (Discontinuities)
| सीमा का नाम | गहराई | किन परतों के बीच | विशेषता |
|---|---|---|---|
| कोनराड असंगति | ~15-20 किमी | ऊपरी और निचली Crust | P-wave गति में वृद्धि |
| मोहोरोविसिक असंगति (Moho) | ~35-70 किमी | Crust और Mantle | P-wave गति में तेज वृद्धि |
| रेपेटीटी असंगति | ~410 किमी | ऊपरी और संक्रमण मेंटल | ओलिवीन → वैड्सलेइट |
| 660 किमी असंगति | ~660 किमी | संक्रमण और निचली मेंटल | रिंगवुडाइट → ब्रिजमेनाइट |
| गटेनबर्ग असंगति | ~2,900 किमी | Mantle और Outer Core | P-wave गति में तेज कमी, S-wave रुकना |
| लेहमैन असंगति | ~5,150 किमी | Outer Core और Inner Core | P-wave गति में वृद्धि |
कोर हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
पृथ्वी का कोर हमारे लिए केवल एक वैज्ञानिक उत्सुकता नहीं है — यह हमारे अस्तित्व का आधार है। Mahek Institute Rewa इस बात पर जोर देता है कि विज्ञान केवल किताबों तक सीमित नहीं है — यह हमारे जीवन से गहराई से जुड़ा है। आइए समझें कोर हमारे लिए क्यों मायने रखता है:
1. चुंबकीय क्षेत्र — अदृश्य रक्षा कवच
बाहरी कोर द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र हमें सौर विकिरणों से बचाता है। बिना इसके, सूर्य की पार्टिकल वायुमंडल को धीरे-धीरे उड़ा देतीं और पृथ्वी मंगल ग्रह जैसी बंजर हो जाती। चुंबकीय क्षेत्र के कारण ही सैटेलाइट संचार, GPS, और रेडियो संचार संभव है। चुंबकीय क्षेत्र के बिना, इन तकनीकों का अस्तित्व नहीं होता।
2. टेक्टोनिक प्लेटें और ज्वालामुखी
कोर से निकलने वाली ऊष्मा मेंटल में संवहन धाराओं को प्रेरित करती है, जो टेक्टोनिक प्लेटों को चलाती हैं। ये प्लेटें महाद्वीपों का निर्माण करती हैं, पर्वतों को जन्म देती हैं, और ज्वालामुखीय गतिविधि का कारण बनती हैं। ज्वालामुखीय राख से मिट्टी उपजाऊ बनती है — इसलिए ज्वालामुखीय क्षेत्रों में कृषि सबसे अधिक होती है। कोर की ऊष्मा के बिना, पृथ्वी एक ठंडी, निष्क्रिय चट्टान होती।
3. भूतापीय ऊर्जा (Geothermal Energy)
पृथ्वी के भीतर की ऊष्मा एक अक्षय और स्वच्छ ऊर्जा स्रोत है। भूतापीय ऊर्जा प्लांट इस ऊष्मा का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए करते हैं। आइसलैंड, न्यूजीलैंड, और अमेरिका में यह तकनीक सफलतापूर्वक काम कर रही है। भारत में भी भूतापीय ऊर्जा की संभावनाएँ हैं — विशेषकर हिमालयी क्षेत्र और पश्चिमी तट पर। Mahek Institute Rewa नवीकरणीय ऊर्जा के इस स्रोत पर अपने छात्रों को जागरूक करता है।
4. खनिजों का भंडार
पृथ्वी के विभेदीकरण (Differentiation) की प्रक्रिया ने भारी धातुओं को कोर में भेजा और हल्के तत्वों को सतह पर लाया। लेकिन कुछ मूल्यवान धातुएँ — सोना, प्लैटिनम, डायमंड — ज्वालामुखीय और टेक्टोनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सतह तक आईं। ये सभी प्रक्रियाएँ कोर से उत्पन्न ऊष्मा द्वारा संचालित हैं।
5. जलवायु नियंत्रण
टेक्टोनिक प्लेटें महासागरों की धाराओं को प्रभावित करती हैं, जो वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करती हैं। ज्वालामुखीय विस्फोट वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, जो अस्थायी रूप से पृथ्वी को ठंडा कर सकते हैं। कार्बन चक्र भी टेक्टोनिक गतियों से जुड़ा है — सबडक्शन के दौरान कार्बन को पृथ्वी के भीतर ले जाया जाता है और ज्वालामुखीय विस्फोटों से वापस वायुमंडल में आता है। यह सब कोर की ऊष्मा के बिना संभव नहीं।
पृथ्वी का कोर धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है। आंतरिक कोर बढ़ रहा है क्योंकि तरल लोहा ठोस हो रहा है। अरबों वर्षों बाद, पूरा कोर ठोस हो जाएगा, चुंबकीय क्षेत्र समाप्त हो जाएगा, और पृथ्वी मंगल ग्रह जैसी हो जाएगी। लेकिन चिंता की बात नहीं — यह प्रक्रिया अरबों वर्ष लेगी, और उससे पहले सूर्य एक लाल दानव (Red Giant) बन जाएगा और पृथ्वी को निगल लेगा!
वैज्ञानिक कोर का अध्ययन कैसे करते हैं?
कोर तक सीधे पहुँच असंभव है, फिर भी वैज्ञानिकों ने कई अभिनव तकनीकों का विकास किया है जो पृथ्वी के भीतर झाँकने में मदद करती हैं। Mahek Institute Rewa इन तकनीकों के बारे में जानकारी प्रदान करता है:
1. भूकंप विज्ञान (Seismology)
यह सबसे प्रभावी और सबसे पुरानी तकनीक है। वैश्विक भूकंप नेटवर्क (Global Seismographic Network) में हजारों भूकंपमापी (Seismometers) स्थापित हैं जो भूकंप तरंगों को रिकॉर्ड करते हैं। इन तरंगों की गति, आयाम, और आगमन समय का विश्लेषण करके वैज्ञानिक पृथ्वी के भीतर की संरचना का 3D मॉडल बनाते हैं। इसे भूकंपीय टोमोग्राफी (Seismic Tomography) कहते हैं — ठीक वैसे ही जैसे CT स्कैन शरीर की आंतरिक छवियाँ बनाता है।
2. डायमंड एनविल सेल (Diamond Anvil Cell)
इस लेबोरेटरी तकनीक में दो उच्च-गुणवत्ता वाले हीरों के बीच लोहे के नमूने को रखा जाता है और अत्यधिक दबाव (350 GPa तक) लगाया जाता है। लेजर से नमूने को 5,000°C तक गर्म किया जाता है। फिर सिंक्रोट्रॉन X-रे विवर्तन (Synchrotron X-ray Diffraction) से क्रिस्टल संरचना, गलनांक, और अन्य गुणों को मापा जाता है। यह तकनीक प्रयोगशाला में कोर की स्थितियाँ बनाने का सबसे प्रभावी तरीका है।
3. शॉक कंप्रेशन प्रयोग
इसमें गैस बंदूक, लेजर-संचालित शॉक तरंगों, या विस्फोटक चार्जों का उपयोग करके लोहे के नमूनों पर अत्यंत उच्च दबाव और तापमान लगाया जाता है। ये प्रयोग कोर की स्थितियों को नैनोसेकंड के लिए बना सकते हैं। लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी और सैंडिया नेशनल लेबोरेटरी जैसी संस्थाएँ इस क्षेत्र में अग्रणी हैं।
4. कंप्यूटर सिमुलेशन
सुपरकंप्यूटरों पर चलने वाले जिओडायनामो सिमुलेशन बाहरी कोर में तरल लोहे के प्रवाह और चुंबकीय क्षेत्र के निर्माण का अनुकरण करते हैं। ये सिमुलेशन वास्तविक अवलोकनों के साथ मिलाकर जाँचे जाते हैं। भारत के प्रमुख सुपरकंप्यूटर — PARAM सिवाय और PARAM प्रव्य — भी इस तरह के शोध में योगदान दे रहे हैं।
5. उल्कापिंडों का अध्ययन
आयरन मीटियोराइट्स (लौह उल्कापिंड) पृथ्वी के कोर की संरचना के सबसे निकटतम प्राकृतिक नमूने हैं। इन उल्कापिंडों का अध्ययन कोर की रासायनिक संरचना, क्रिस्टल संरचना, और शीतलन दर को समझने में मदद करता है। कुछ उल्कापिंडों में विडमैनस्टेटन पैटर्न (Widmanstätten Pattern) पाया जाता है — एक सुंदर ज्यामितीय पैटर्न जो लाखों वर्षों में अत्यंत धीमी गति से ठंडे होने पर बनता है।
6. गुरुत्वाकर्षण मापन
GRACE (Gravity Recovery and Climate Experiment) और GOCE (Gravity Field and Steady-State Ocean Circulation Explorer) जैसे उपग्रह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र का सटीक मानचित्रण करते हैं। गुरुत्वाकर्षण में असमानताएँ पृथ्वी के भीतर घनत्व के वितरण के बारे में जानकारी देती हैं, जो कोर की संरचना को समझने में मदद करती हैं।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के उपग्रह और राष्ट्रीय भूभौतिक अनुसंधान संस्थान (NGRI), हैदराबाद के शोधकर्ता पृथ्वी के कोर के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। NGRI ने भारतीय उपमहाद्वीप के नीचे मेंटल की संरचना पर महत्वपूर्ण शोध प्रकाशित किया है। Mahek Institute Rewa भारतीय वैज्ञानिकों के इन योगदानों को अपने छात्रों तक पहुँचाता है।
कोला सुपरडीप बोरहोल — मानव का सबसे गहरा प्रयास
कोला सुपरडीप बोरहोल (Kola Superdeep Borehole) पृथ्वी की सतह को भेदने का सबसे महत्वाकांक्षी और सबसे गहरा प्रयास है। 1970 में सोवियत संघ ने कोला प्रायद्वीप (रूस) पर इस परियोजना की शुरुआत की। 24 वर्षों के अथक प्रयास के बाद, 1994 में इसे 12,262 मीटर (12.2 किमी) की गहराई पर बंद कर दिया गया।
यह परियोजना कई कारणों से अद्वितीय थी:
प्रमुख खोजें
1. भूतापीय ढाल अपेक्षा से अधिक: वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था कि 12 किमी गहराई पर तापमान लगभग 100°C होगा। लेकिन वास्तविक तापमान 180°C था — अनुमान से लगभग दोगुना! इसने गहराई पर तापमान के मॉडल को पूरी तरह बदल दिया।
2. जल 7 किमी गहराई में: वैज्ञानिकों ने 7 किमी से अधिक गहराई में भी पानी पाया — यह अपेक्षित नहीं था। यह पानी सतह से नहीं आया था, बल्कि खनिजों में बंद हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बना था। इस खोज ने पृथ्वी के भीतर जल चक्र की समझ को बदल दिया।
3. जीवाश्म 6 किमी गहराई में: 6 किमी की गहराई में ग्रैप्टोलाइट (Graptolite) जीवाश्म और 2 अरब वर्ष पुराने सूक्ष्मजीव जीवाश्म पाए गए। इससे पता चला कि जीवन के अवशेष पृथ्वी की सतह से बहुत नीचे तक मौजूद हैं।
4. चट्टानें अपेक्षा से भिन्न: वैज्ञानिकों ने सोचा था कि लगभग 7 किमी की गहराई में ग्रेनाइट से बेसाल्ट में संक्रमण होगा (कोनराड असंगति)। लेकिन यह संक्रमण नहीं मिला — बल्कि ग्रेनाइट और बेसाल्ट की परतें एक-दूसरे में मिली हुई थीं।
क्यों बंद किया गया?
परियोजना को तीन मुख्य कारणों से बंद किया गया: (1) अत्यधिक तापमान (180°C) के कारण ड्रिलिंग उपकरण क्षतिग्रस्त हो रहे थे; (2) सोवियत संघ के विघटन के बाद धन की कमी; (3) लक्ष्य (15 किमी) तक पहुँचना तकनीकी रूप से असंभव प्रतीत हो रहा था।
भविष्य की परियोजनाएँ — क्या हम कभी कोर तक पहुँचेंगे?
कोला बोरहोल के बाद भी वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की सतह को भेदने के प्रयास जारी रखे हैं। जापान की चिक्यू (Chikyu) जहाज-आधारित ड्रिलिंग परियोजना महासागरीय भूपर्पटी को भेदने का प्रयास कर रही है। महासागरीय भूपर्पटी महाद्वीपीय भूपर्पटी से पतली (5-10 किमी) होने के कारण मेंटल तक पहुँचना अधिक संभव है।
MOHOLE परियोजना
1960 के दशक में अमेरिका ने Project Mohole शुरू किया, जिसका लक्ष्य मोहोरोविसिक असंगति (Moho) तक पहुँचना था — यानी भूपर्पटी को भेदकर मेंटल तक पहुँचना। इस परियोजना ने 1961 में प्रशांत महासागर में 183 मीटर ड्रिलिंग की, लेकिन धन की कमी के कारण 1966 में बंद कर दी गई।
JODES Resolution और Chikyu
Integrated Ocean Drilling Program (IODP) के तहत दो प्रमुख ड्रिलिंग जहाज काम कर रहे हैं — JOIDES Resolution (अमेरिकी) और Chikyu (जापानी)। Chikyu विशेष रूप से महत्वाकांक्षी है — इसका लक्ष्य महासागरीय भूपर्पटी को पूरी तरह भेदकर मेंटल तक पहुँचना है। यदि सफल होती है, तो यह मानव इतिहास में पहली बार होगा जब हम पृथ्वी के मेंटल से सीधे नमूने प्राप्त करेंगे।
क्या कोर तक पहुँचना संभव है?
वर्तमान तकनीक से कोर (2,900 किमी) तक पहुँचना असंभव है। लेकिन विज्ञान का इतिहास बताता है कि "असंभव" एक अस्थायी शब्द है। भविष्य में नई तकनीकें — जैसे लेजर ड्रिलिंग, प्लाज्मा बोरिंग, या नैनो-रोबोटिक्स — कोर तक पहुँचना संभव बना सकती हैं। लेकिन तब तक, हमें भूकंप तरंगों और लेबोरेटरी प्रयोगों पर निर्भर रहना होगा।
2003 की फिल्म "The Core" में वैज्ञानिक एक विशेष जहाज से पृथ्वी के कोर तक पहुँचते हैं और चुंबकीय क्षेत्र को पुनः आरंभ करते हैं। हालांकि यह फिल्म वैज्ञानिक रूप से अत्यंत अशुद्ध है, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है — क्या होगा यदि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र समाप्त हो जाए? Mahek Institute Rewa के छात्रों को ऐसे प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
पृथ्वी का कोर और जीवन — एक अविभाज्य संबंध
जब हम जीवन के बारे में सोचते हैं, तो आमतौर पर सूर्य, पानी, और वायुमंडल के बारे में सोचते हैं। लेकिन पृथ्वी का कोर जीवन के अस्तित्व का एक मौलिक आधार है। आइए इस संबंध को समझें:
चुंबकीय क्षेत्र और वायुमंडल की रक्षा
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र (जो बाहरी कोर में उत्पन्न होता है) वायुमंडल को सौर हवा से बचाता है। बिना चुंबकीय क्षेत्र के, सौर हवा वायुमंडल को धीरे-धीरे उड़ा देती — ठीक वैसे ही जैसे मंगल ग्रह ने अपना वायुमंडल खोया। बिना वायुमंडल के: कोई ऑक्सीजन नहीं, कोई ओजोन परत नहीं (पारदर्शी UV रक्षा), कोई ग्रीनहाउस प्रभाव नहीं (पृथ्वी बर्फ़ का गोला बन जाती), और कोई तरल पानी नहीं। अर्थात् — कोई जीवन नहीं।
टेक्टोनिक प्लेटें और जीवन का विकास
पृथ्वी सौर मंडल का एकमात्र ग्रह है जिसमें सक्रिय टेक्टोनिक प्लेटें हैं। ये प्लेटें कोर की ऊष्मा द्वारा संचालित संवहन धाराओं के कारण चलती हैं। टेक्टोनिक प्लेटें जीवन के लिए कई तरीकों से महत्वपूर्ण हैं: वे कार्बन चक्र (Carbon Cycle) को नियंत्रित करती हैं, जो जलवायु को स्थिर रखता है; वे पोषक तत्वों (Nutrients) को पुनर्चक्रित करती हैं, जो जैव विविधता को बनाए रखते हैं; और वे महाद्वीपों का निर्माण करती हैं, जो जलीय और स्थलीय जीवन दोनों के लिए आवास प्रदान करते हैं।
ज्वालामुखी और जीवन की उत्पत्ति
ज्वालामुखीय गतिविधि (जो कोर की ऊष्मा द्वारा संचालित है) ने जीवन की उत्पत्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई होगी। हाइड्रोथर्मल वेंट्स (Hydrothermal Vents) — समुद्र के नीचे ज्वालामुखीय छिद्र जहाँ गर्म, खनिज-समृद्ध जल निकलता है — जीवन की उत्पत्ति के सबसे संभावित स्थानों में से एक माने जाते हैं। ये वेंट्स ऊर्जा और रासायनिक यौगिक प्रदान करते हैं जो प्रारंभिक जीवन के लिए आवश्यक थे। आज भी, इन वेंट्स के पास अद्भुत जीव पाए जाते हैं जो सूर्य के प्रकाश के बिना जीवित रहते हैं।
एक्स्ट्रीमोफाइल (Extremophiles) ऐसे सूक्ष्मजीव हैं जो चरम परिस्थितियों में जीवित रहते हैं — अत्यधिक तापमान, दबाव, अम्लता, या विकिरण। गहरे समुद्री बोरहोल में पाए गए थर्मोफाइलिक बैक्टीरिया 122°C तक के तापमान में जीवित रह सकते हैं। यदि जीवन पृथ्वी की सतह के नीचे कई किलोमीटर गहराई में मौजूद है, तो क्या यह संभव है कि मंगल या यूरोपा (बृहस्पति का चंद्रमा) की सतह के नीचे भी जीवन हो? Mahek Institute Rewa ऐसे प्रश्नों पर छात्रों को विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
पृथ्वी के कोर में मुख्य रूप से लोहा (Iron, ~85%) और निकल (Nickel, ~5-10%) है। बाहरी कोर में लगभग 10% हल्के तत्व भी शामिल हैं — सल्फर, ऑक्सीजन, सिलिकॉन, कार्बन और हाइड्रोजन। आंतरिक कोर ठोस है जबकि बाहरी कोर तरल अवस्था में है।
पृथ्वी के आंतरिक कोर का तापमान लगभग 5,400°C (9,800°F) है, जो सूर्य की सतह के तापमान के लगभग बराबर है। बाहरी कोर का तापमान 4,400°C से 5,000°C के बीच है।
वर्तमान तकनीक से नहीं। मानव द्वारा खोदा गया सबसे गहरा छेद — कोला सुपरडीप बोरहोल — मात्र 12.2 किमी गहरा है, जबकि कोर 2,900 किमी गहराई में है। कोर तक पहुँचने के लिए वर्तमान तकनीक से कोई मार्ग नहीं है।
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र बाहरी कोर में चलने वाली तरल लोहे की संवहन धाराओं द्वारा उत्पन्न होता है। इस प्रक्रिया को जिओडायनामो (Geodynamo) कहते हैं। पृथ्वी के घूर्णन के कारण कोरियोलिस प्रभाव लगता है, जो विद्युत धाराओं को सर्पिल आकार देता है और चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है।
आंतरिक कोर में दबाव अत्यंत अधिक (330-360 GPa) है — यह वायुमंडलीय दबाव से 3.6 मिलियन गुना अधिक है। इतने उच्च दबाव में, लोहे का गलनांक तापमान से अधिक हो जाता है, इसलिए लोहा ठोस अवस्था में रहता है। बाहरी कोर में दबाव कम है, इसलिए वह तरल है।
हाँ, लेकिन अरबों वर्षों बाद। पृथ्वी का कोर धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है और आंतरिक कोर बढ़ रहा है। जब पूरा कोर ठोस हो जाएगा, तो जिओडायनामो बंद हो जाएगा और चुंबकीय क्षेत्र समाप्त हो जाएगा। लेकिन इसमें अरबों वर्ष लगेंगे — उससे पहले सूर्य लाल दानव बन जाएगा।
कोला सुपरडीप बोरहोल 12,262 मीटर (12.2 किमी) गहरा है। यह मानव द्वारा खोदा गया सबसे गहरा छेद है, लेकिन यह पृथ्वी की त्रिज्या का मात्र 0.19% है।
अनुमानों के अनुसार, पृथ्वी के कोर में इतना सोना है कि यदि इसे सतह पर लाया जाए, तो पूरी पृथ्वी को 1.5 फीट (लगभग 45 सेमी) मोटी सोने की परत से ढका जा सकता है। लोहे के साथ सोना भी भारी तत्व है और विभेदीकरण के दौरान कोर में चला गया।
पृथ्वी की चार मुख्य परतें हैं: (1) भूपर्पटी (Crust) — सबसे बाहरी, पतली, ठोस परत; (2) मेंटल (Mantle) — सबसे मोटी परत, अर्ध-ठोस; (3) बाहरी कोर (Outer Core) — तरल लोहे की परत; (4) आंतरिक कोर (Inner Core) — सबसे गहरी, ठोस लोहे की परत।
हाँ, आंतरिक कोर प्रति वर्ष लगभग 1 मिलीमीटर की दर से बढ़ रहा है। जब तरल लोहा बाहरी कोर से ठोस आंतरिक कोर में जमता है, तो आंतरिक कोर का आकार बढ़ता है। यह प्रक्रिया पृथ्वी के शीतलन का परिणाम है।
ज्ञान परीक्षा (Quiz) — अपनी जानकारी की जाँच करें
इस क्विज़ से पृथ्वी के कोर के बारे में अपनी समझ की जाँच करें। Mahek Institute Rewa द्वारा प्रस्तुत:
📝 क्विज़ — Earth Core
1. पृथ्वी के कोर में मुख्य रूप से कौन सा तत्व पाया जाता है?
2. पृथ्वी की सबसे मोटी परत कौन सी है?
3. बाहरी कोर की अवस्था क्या है?
4. पृथ्वी के आंतरिक कोर का तापमान लगभग कितना है?
5. कोर-मेंटल सीमा की गहराई लगभग कितनी है?
6. पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र कहाँ उत्पन्न होता है?
7. मानव द्वारा खोदा गया सबसे गहरा छेद कौन सा है?
8. आंतरिक कोर की खोज किसने की थी?
9. S-तरंगें किस माध्यम से नहीं गुजर सकतीं?
10. गटेनबर्ग असंगति किन परतों के बीच है?
निष्कर्ष — पृथ्वी का कोर: हमारे अस्तित्व का आधार
इस विस्तृत लेख में हमने पृथ्वी के कोर के बारे में व्यापक जानकारी प्राप्त की। आइए मुख्य बिंदुओं का सारांश प्रस्तुत करें:
✅ पृथ्वी चार मुख्य परतों से बनी है: भूपर्पटी, मेंटल, बाहरी कोर, और आंतरिक कोर।
✅ कोर मुख्य रूप से लोहे (~85%) और निकल (~5-10%) से बना है।
✅ बाहरी कोर तरल है और यही पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का स्रोत है।
✅ आंतरिक कोर अत्यधिक दबाव के कारण ठोस है, तापमान ~5,400°C।
✅ कोर की खोज भूकंप तरंगों के अध्ययन से हुई — विशेषकर इंगे लेहमैन का योगदान।
✅ चुंबकीय क्षेत्र हमें सौर विकिरणों से बचाता है — बिना इसके जीवन संभव नहीं।
✅ कोला सुपरडीप बोरहोल (12.2 किमी) सबसे गहरा मानव निर्मित छेद है।
✅ नवीनतम शोधों से आंतरतम कोर, कोर के घूर्णन में बदलाव, और हल्के तत्वों की पहचान हुई है।
✅ पृथ्वी का कोर धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है — अरबों वर्षों बाद चुंबकीय क्षेत्र समाप्त होगा।
पृथ्वी का कोर केवल एक वैज्ञानिक विषय नहीं है — यह हमारे अस्तित्व की कहानी है। यह बताता है कि कैसे एक गलते हुए लोहे का गोला, अरबों वर्षों की प्रक्रियाओं के माध्यम से, एक ऐसे ग्रह को जन्म देता है जिसपर जीवन फलता-फूलता है। यह हमें यह भी याद दिलाता है कि पृथ्वी कितनी नाजुक है — मंगल ग्रह की कहानी हमें चेतावनी देती है कि कोर के ठंडे होने का क्या परिणाम होता है।
Mahek Institute Rewa का मिशन है कि विज्ञान की इन गहरी समझों को प्रत्येक छात्र तक पहुँचाया जाए। हम मानते हैं कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती — चाहे वह पृथ्वी के कोर जितना गहरा हो या अंतरिक्ष जितना विशाल। हमारे छात्रों को न केवल पाठ्यक्रम सिखाया जाता है, बल्कि वैज्ञानिक चिंतन, तार्किक क्षमता, और जिज्ञासा की भावना विकसित की जाती है।
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इस लेख में उपयोग किए गए प्रमुख स्रोत:
• Dziewonski, A.M. & Anderson, D.L. (1981). "Preliminary reference Earth model." Physics of the Earth and Planetary Interiors.
• Lehmann, I. (1936). "P'." Publications du Bureau Central Séismologique International.
• Song, X. & Richards, P.G. (1996). "Seismological evidence for differential rotation of the Earth's inner core." Nature.
• Anzellini, S. et al. (2013). "Melting of iron at Earth's inner core boundary based on fast X-ray diffraction." Science.
• Romanowicz, B. (2023). "Innermost inner core." Physics of the Earth and Planetary Interiors.
• ESA Swarm Mission Data (2024).
• USGS Earthquake Hazards Program.
• National Geographic, NASA, और अन्य प्रामाणिक स्रोत।
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